
देहरादून | उत्तराखंड में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। राजधानी देहरादून के पलटन बाजार समेत कई इलाकों की मस्जिदों में ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय से 40 साल पुराने दस्तावेज (पहचान पत्र, निवास और मतदाता सूची) जुटाने की अपील की गई है। इन पोस्टरों के सामने आने के बाद डेमोग्राफी चेंज और ‘बाहरी बनाम मूल निवासी’ के मुद्दे पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।
खबर की बड़ी बातें:
- विवाद की वजह: मस्जिदों में लगे पोस्टर, जिनमें 40 साल पुराने कागजात सुरक्षित रखने को कहा गया है।
- क्या है SIR: निर्वाचन आयोग की वह प्रक्रिया जिसमें मतदाता सूची का भौतिक सत्यापन और फर्जी नामों को हटाने का काम होता है।
- सियासी घमासान: बीजेपी ने मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग की, कांग्रेस ने संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया।
- प्रशासन का पक्ष: निर्वाचन अधिकारी ने कहा- हमने 40 साल पुराने कोई दस्तावेज नहीं मांगे हैं।
आखिर मस्जिदों में क्यों लगे पोस्टर?
देहरादून के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में जमीयत उलेमा-ए-हिंद से जुड़े कार्यकर्ताओं ने ये पोस्टर लगाए हैं। इनमें समुदाय के लोगों को सलाह दी गई है कि वे अपने पुराने निवास प्रमाण पत्र और वोटर लिस्ट में दर्ज रिकॉर्ड को व्यवस्थित कर लें, ताकि सरकारी सत्यापन के दौरान कोई समस्या न हो। शहर काजी हाशमी ने कहा कि वे फिलहाल बाहर से लौटे हैं और इस मामले की जानकारी जुटा रहे हैं, लेकिन लोगों को अपने दस्तावेज दुरुस्त रखने की सलाह पहले भी दी जाती रही है।
क्या है SIR और क्यों है इस बार खास?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत उत्तराखंड के 11,733 पोलिंग बूथों पर मतदाताओं का वेरिफिकेशन होना है। करीब 811 नए बूथ भी बनाए जा सकते हैं। इस बार प्रशासन का जोर उन मतदाताओं पर है जो मौके पर नहीं मिल रहे हैं या जिनका नाम दो राज्यों की वोटर लिस्ट में दर्ज है।
राजनीतिक वार-पलटवार
कांग्रेस: “संविधान के अनुरूप काम हो”
कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने कहा, “हम सभी बूथों पर अपना नेटवर्क मजबूत कर रहे हैं। बीजेपी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर राजनीति कर सकती है। हम संविधान के अनुरूप काम करने वाले लोग हैं और पश्चिम बंगाल जैसे हालात यहां न हों, इसके लिए सबको जागरूक कर रहे हैं।”
बीजेपी: “फर्जी वोटरों की पहचान जरूरी”
बीजेपी प्रवक्ता मनवीर सिंह चौहान ने कहा, “पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया है। हमारा जोर उन मतदाताओं की पहचान पर है जो क्षेत्र में नहीं रहते या जिनके नाम संदिग्ध हैं। मतदाता सूची पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। एक व्यक्ति का नाम दो राज्यों में होना लोकतंत्र के लिए चुनौती है।”
मलिन बस्तियों और जनसांख्यिकी पर नजर
SIR को लेकर सबसे ज्यादा हलचल देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में है। आरोप लगते रहे हैं कि रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियों के किनारे बसी अवैध बस्तियों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग रह रहे हैं, जिनके नाम दूसरे राज्यों में भी दर्ज हैं।
प्रशासन की चेतावनी: “घबराएं नहीं, कार्रवाई होगी”
उप निर्वाचन अधिकारी अभिनव शाह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “हमारी ओर से 40 साल पुराने कागज मांगने जैसी कोई शर्त नहीं रखी गई है। हमने 85% वोटरों का मिलान पूरा कर लिया है। अगर शहर में इस तरह के भ्रामक पोस्टर लगे हैं, तो हम इसकी जांच करेंगे और कार्रवाई करेंगे। SIR से किसी भी नागरिक को घबराने की जरूरत नहीं है।”
