देहरादून: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे’ ने उत्तराखंड की कनेक्टिविटी में क्रांति तो ला दी है, लेकिन अब यही रफ्तार देहरादून और मसूरी जैसे पर्यटन स्थलों के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है। महज ढाई घंटे में दिल्ली से देहरादून पहुंचने की सुविधा ने पर्यटकों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है, जिससे शहर का मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया है।
एक्सप्रेसवे बनने से पहले दिल्ली से देहरादून की यात्रा में 5 से 6 घंटे लगते थे, जो अब घटकर ढाई घंटे रह गई है। इस तेज कनेक्टिविटी का नतीजा यह है कि दिल्ली-एनसीआर से हजारों की संख्या में पर्यटक एक ही दिन के सफर पर देहरादून और मसूरी पहुंच रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर 100-120 किमी की रफ्तार से आने वाले वाहन जैसे ही देहरादून की सीमाओं में प्रवेश करते हैं, उन्हें दशकों पुरानी संकरी सड़कों और भारी भीड़ का सामना करना पड़ता है, जिससे पूरा शहर ‘ओपन एयर पार्किंग’ में तब्दील हो जाता है।
पहाड़ों की रानी मसूरी में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं। आंकड़ों के मुताबिक:
वर्तमान में चल रही चारधाम यात्रा ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। गंगोत्री और यमुनोत्री जाने वाले तीर्थयात्री भी देहरादून मार्ग का उपयोग कर रहे हैं। पर्यटकों और श्रद्धालुओं के इस दोहरे दबाव के कारण पुलिस प्रशासन के लिए ट्रैफिक संभालना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
बढ़ते ट्रैफिक को देखते हुए देहरादून पुलिस और प्रशासन अब ‘प्लान-बी’ पर काम कर रहे हैं।
“यह एक्सप्रेसवे एक मील का पत्थर है, लेकिन अचानक बढ़ी भीड़ ने चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर फिलहाल इस दबाव के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। हम ट्रैफिक को शहर के बाहर ही रोकने और जरूरत पड़ने पर हरिद्वार रूट पर डायवर्ट करने की योजना बना रहे हैं।”— प्रमेंद्र डोबाल, एसएसपी देहरादून
“एक्सप्रेसवे से राज्य को आर्थिक लाभ हो रहा है। हम पर्यटकों और स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए जल्द ही बिंदाल से राजपुर मार्ग को एक नई पहचान देने वाली परियोजना धरातल पर लाएंगे। जाम की समस्या को कम करने के लिए विभाग दीर्घकालिक योजनाओं पर काम कर रहा है।”— प्रदीप बत्रा, परिवहन मंत्री, उत्तराखंड
एक्सप्रेसवे ने उत्तराखंड के पर्यटन को नए पंख तो दिए हैं, लेकिन देहरादून की संकरी सड़कों और मसूरी की सीमित क्षमता के बीच संतुलन बिठाना अब सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक शहर के भीतर फ्लाईओवर्स और वैकल्पिक मार्गों का जाल नहीं बिछता, तब तक यह ‘रफ्तार’ राहत कम और आफत ज्यादा बनी रहेगी।
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