बाबा हाथीराम की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान बालाजी हर रात उनके आश्रम में चौपड़ खेलने आते थे। एक दिन खेलते-खेलते भगवान अत्यंत आनंदित हो गए और अपनी कृपा से बाबा हाथीराम को अपार स्वर्ण प्रदान किया।
कुछ समय बाद, जब राजा के सैनिक मंदिर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां की मूर्तियों से समस्त स्वर्ण और चांदी गायब था। इस घटना की जानकारी राजा को दी गई और खोजबीन करने पर वही स्वर्ण बाबा हाथीराम के घर में मिला। जब बाबा ने सच्ची बात बताई, तो राजा ने इसे झूठ मानकर बाबा को दंडित करने का निर्णय लिया। उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया और उसमें गन्ने की एक विशाल ढेरी भरवा दी गई। शर्त थी कि यदि बाबा ने एक ही रात में सारा गन्ना समाप्त नहीं किया, तो उन्हें चोरी के अपराध में चौराहे पर फांसी दी जाएगी।
बेचारे बाबा ने भगवान से अपनी रक्षा की प्रार्थना की और सच्चे हृदय से उन्हें पुकारा। उनकी पुकार सुनकर भगवान बालाजी स्वयं हाथी का रूप धारण कर प्रकट हुए। बाबा ने उन्हें पहचानकर नमन किया और भगवान की कृपा से सारा गन्ना शीघ्र समाप्त हो गया। उसके बाद, भगवान ने फाटक तोड़ दिया और गरजते हुए जंगल की ओर निकल गए, जहां वे अंतर्ध्यान हो गए।
इस दिव्य चमत्कार को देखकर सभी लोगों ने बाबा हाथीराम से क्षमा मांगी और उनकी भक्ति को नमन किया। तभी से बाबा हाथीराम की प्रसिद्धि संपूर्ण क्षेत्र में फैल गई।
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