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दानवीर कर्ण का सबसे बड़ा बलिदान!

महाभारत के महायुद्ध की रणभेरी बजने को थी, और सभी योद्धा अपनी-अपनी शक्तियों को संगठित कर रहे थे। कौरवों के पक्ष में एक ऐसा महारथी था, जिसकी उपस्थिति मात्र से पांडव खेमे में चिंता व्याप्त थी – वह था सूर्यपुत्र कर्ण। भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि कर्ण केवल एक महान धनुर्धर ही नहीं, बल्कि जन्म से प्राप्त अपने दिव्य कवच और कुंडल के कारण अजेय भी था। यह कवच उसे किसी भी दिव्य अस्त्र से बचाता था। ऐसे में, जब तक कर्ण के पास यह दिव्य सुरक्षा थी, तब तक अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। दूसरी ओर देवराज इंद्र भी अपने पुत्र अर्जुन के जीवन को लेकर अत्यंत चिंतित थे।

भगवान कृष्ण और इंद्र दोनों इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि धर्म की स्थापना और अर्जुन की रक्षा के लिए कर्ण से उसके कवच-कुंडल लेना अनिवार्य है। इसके लिए उन्होंने एक योजना बनाई। वे जानते थे कि कर्ण अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध है और सूर्यदेव की उपासना के बाद अपने द्वार पर आए किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता।योजना के अनुसार, देवराज इंद्र एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास उस समय पहुँचे, जब वह सूर्य की उपासना कर दान दे रहा था।इंद्र ने कर्ण से भिक्षा की याचना की। कर्ण ने कहा, “हे विप्रवर! आप जो भी स्वर्ण, भूमि या गौ चाहेंगे, वह आपको मिलेगा। आप आज्ञा करें। “ब्राह्मण रूपी इंद्र ने कहा, “राजन, मुझे धन-संपत्ति नहीं चाहिए। परंतु मैं जो माँगूँगा, उसे देने का आपको पहले वचन देना होगा।” अपने प्रण पर अडिग कर्ण ने बिना सोचे-समझे हाथ में जल लेकर वचन दे दिया। वचनबद्ध होते ही इंद्र ने अपनी असली मंशा प्रकट की और कहा, “हे दानवीर! मैं आपके शरीर पर जन्म से स्थित यह कवच और कुंडल दान में चाहता हूँ।” यह सुनकर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कर्ण समझ गए कि यह उनके साथ एक छल है और यह ब्राह्मण कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।

फिर भी, अपने वचन की लाज रखने के लिए दानवीर कर्ण ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। उन्होंने अपनी कटार से, असहनीय पीड़ा सहते हुए, अपने शरीर से चिपके कवच और कुंडल को अलग किया और रक्त से सने उस अभेद्य कवच को ब्राह्मण को सौंप दिया।इंद्र कर्ण के इस त्याग को देखकर कांप गए और लज्जित भी हुए। वे तुरंत कवच और कुंडल लेकर अपने रथ पर सवार होकर भागे। लेकिन कुछ ही दूर जाने पर उनका रथ धरती में धंस गया। तभी एक आकाशवाणी हुई, ‘देवराज इंद्र, तुमने यह बहुत बड़ा पाप किया है! अपने पुत्र अर्जुन के प्राण बचाने के लिए तुमने छल से एक धर्मात्मा के प्राण संकट में डाल दिए हैं। यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तुम भी यहीं धंस जाओगे।’

आकाशवाणी सुनकर इंद्र भयभीत हो गए और अपने किए पर पश्चाताप करने लगे। इस पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने कर्ण को वरदान देने का निश्चय किया। उन्होंने कर्ण को अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र ‘वासवी शक्ति’ प्रदान किया और कहा कि इसका प्रयोग वह एक बार किसी भी अजेय शत्रु पर कर सकते हैं, उसका विनाश निश्चित है।इस प्रकार, कर्ण ने अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच-कुंडल का दान करके “दानवीर” की अपनी उपाधि को इतिहास में अमर कर दिया।

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