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महादेव के दर्शन से पहले नंदी के दर्शन क्यों ज़रूरी हैं?

प्राचीन काल की बात है, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच जीवन के रहस्यों पर चर्चा हो रही थी। बातों ही बातों में महादेव ने एक ऐसा वचन कह दिया, जिससे सृष्टि का संतुलन ही डगमगा गया। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए पार्वती जी से कहा, “हे देवी! यह संपूर्ण संसार, यह प्रकृति और यहाँ तक कि यह भोजन, सब कुछ केवल ‘माया’ (भ्रम) है। आत्मा की तृप्ति के लिए इन भौतिक वस्तुओं का कोई महत्व नहीं है।”

माता पार्वती, जो स्वयं ‘आदिशक्ति’ और ‘प्रकृति’ हैं, जिनके पोषण से ही यह चराचर जगत जीवित है, इस बात से अत्यंत आहत हुईं। उन्होंने सोचा कि यदि प्रकृति और भोजन केवल माया है, तो मेरे बिना इस संसार का अस्तित्व कैसे संभव होगा? शिव को और संसार को अन्न का महत्व समझाने के लिए देवी ने एक कठोर निर्णय लिया।
क्रोध और दुःख के मिश्रित भाव के साथ उन्होंने कहा, “यदि मैं और मेरा सृजन केवल माया है, तो देखिए मेरे बिना इस संसार की क्या स्थिति होती है।”

इतना कहते ही माता पार्वती अंतर्धान हो गईं।
देवी के लुप्त होते ही ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। धरती से हरियाली गायब हो गई। लहलहाते खेत बंजर भूमि में बदल गए, फलों से लदे वृक्ष सूखकर काठ हो गए और कल-कल बहती नदियां रेगिस्तान की भांति सूख गईं।
संसार में भयानक अकाल पड़ गया। न मनुष्यों के पास खाने को अन्न था, न पशु-पक्षियों के पास। यहाँ तक कि कैलाश पर रहने वाले शिव के गण और स्वयं देवता भी भूख से व्याकुल हो उठे। चारों ओर केवल “त्राहि-माम, त्राहि-माम” की पुकार थी।
अपने भक्तों और संतानों की यह दशा देखकर भगवान शिव का हृदय पसीज गया। भूख की ज्वाला ने जब सबको घेर लिया, तब महादेव को यह ज्ञान हुआ कि “अन्न केवल माया नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। आत्मा की मुक्ति के लिए भी शरीर का जीवित रहना आवश्यक है, और शरीर के लिए अन्न।”

संसार को भुखमरी से बचाने के लिए, त्रिलोक के स्वामी भगवान शिव ने एक साधारण भिक्षुक का रूप धारण किया। उनके हाथों में जो कपाल (भिक्षा पात्र) था, वह खाली था। वे पृथ्वी पर द्वार-द्वार भिक्षा मांगने गए, परन्तु अकाल के कारण धरती पर किसी के पास देने के लिए एक दाना भी न था। शिव का पात्र खाली ही रहा।
तभी आकाशवाणी हुई और शिव को ज्ञात हुआ कि उनकी शक्ति, माता पार्वती, काशी नगरी में अपनी करुणा बरसा रही हैं। वे वहां ‘माँ अन्नपूर्णा’ के रूप में प्रकट हुई हैं और उन्होंने एक विशाल रसोई स्थापित की है, जहाँ से कोई भूखा नहीं लौटता।
यह समाचार मिलते ही शिव वायु वेग से काशी पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि देवी एक भव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके एक हाथ में स्वर्ण पात्र और दूसरे में रत्नजड़ित कलछी थी। वे अपने पुत्रों (संसार के जीवों) को भोजन करा रही थीं।
जगदीश्वर शिव, देवी के द्वार पर एक याचक की भांति खड़े हो गए। उन्होंने आवाज लगाई— “भिक्षां देहि देवी!” (हे देवी, मुझे भिक्षा दें)।

माता अन्नपूर्णा ने भिक्षुक रूप में अपने पति को तुरंत पहचान लिया। उनकी आँखों में करुणा और होठों पर मुस्कान आ गई। शिव ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि संसार में अन्न और प्रकृति का अस्तित्व सत्य है, माया नहीं।
प्रसन्न होकर माता अन्नपूर्णा ने अपनी स्वर्ण कलछी से शिव के खाली कपाल में अन्न (खीर) डाली। वह भोजन मात्र भोजन नहीं था, वह जीवन का अमृत था। शिव ने वह प्रसाद ग्रहण किया और अपनी योग शक्ति से उसे संसार के समस्त प्राणियों में वितरित कर दिया।

देखते ही देखते धरती की प्यास बुझ गई, खेत पुनः लहलहा उठे और संसार से भुखमरी का नाश हुआ।
जिस स्थान पर माता ने स्वयं महादेव को भिक्षा दी थी, आज वही स्थान काशी में ‘श्री अन्नपूर्णा मंदिर’ के नाम से विख्यात है। यह मंदिर प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में स्थित है।

मान्यता है कि माँ अन्नपूर्णा की कृपा से काशी में कभी कोई भूखा नहीं सोता। आज भी मंदिर में देवी की प्रतिमा एक हाथ में स्वर्ण पात्र और दूसरे में कलछी लिए ‘दान मुद्रा’ में विराजमान है, जो हमें याद दिलाती है कि अन्न ही जीवन है और उसका सम्मान करना ईश्वर का सम्मान करना है।

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