ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक लोकगीतों के बीच आयोजित हुआ ऐतिहासिक मेला; टिमरू की छाल से तैयार प्राकृतिक पाउडर से किया गया सामूहिक मत्स्य आखेट।
मसूरी/देहरादून:
उत्तराखंड के जौनपुर क्षेत्र की अनूठी लोक संस्कृति, परंपरा और अद्भुत सामुदायिक एकता का प्रतीक ऐतिहासिक ‘मौण मेला’ शनिवार को अगलाड़ नदी के तट पर पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजित किया गया। ढोल-दमाऊ की गूंज, लोकनृत्यों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के सुरों के बीच शुरू हुए इस ऐतिहासिक लोक-उत्सव में मसूरी सहित आसपास के 114 से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीणों ने हिस्सा लिया। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इस जीवंत पर्व के साक्षी बने।
मेले का शुभारंभ पूरी तरह पारंपरिक विधि-विधान के साथ हुआ। ग्रामीणों ने सबसे पहले टिमरू (एक पहाड़ी औषधीय पौधा) की छाल से तैयार प्राकृतिक पाउडर (मौण) को पूजा-अर्चना के बाद अगलाड़ नदी की धारा में प्रवाहित किया। जैसे ही यह पाउडर नदी के पानी में घुला, हजारों ग्रामीण अपने पारंपरिक उपकरणों जैसे कुंडियाड़ा, फटियाड़ा और जाल के साथ नदी में उतर गए और सामूहिक रूप से मछली पकड़ने की सदियों पुरानी परंपरा को पूरा किया।
स्थानीय निवासी राजेश नौटियाल और सूरज सिंह रावत ने बताया कि इस वर्ष टिमरू का पाउडर तैयार करने की जिम्मेदारी कांडी तल्ला, कांडी मल्ला, मेलेंगढ़, सड़ब तल्ला, सड़ब मल्ला, बेल और परोगी समेत कई प्रमुख गांवों के ग्रामीणों ने निभाई। उन्होंने बताया कि यह केवल मछली पकड़ने का आयोजन नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक धरोहर का महापर्व है, जिसका क्षेत्रवासियों को साल भर इंतजार रहता है।
स्थानीय बुजुर्गों और इतिहास के जानकारों के अनुसार, इस ऐतिहासिक मौण मेले की शुरुआत वर्ष 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश द्वारा की गई थी। समय के साथ पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन मेले को लेकर ग्रामीणों का उत्साह आज भी वैसा ही है। आधुनिकता के इस दौर में भी जौनपुर क्षेत्र ने अपनी इस सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक जुड़ाव को पूरी जीवंतता के साथ सहेज कर रखा है।
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता इसका पर्यावरण के अनुकूल होना है। मछली पकड़ने के लिए नदी में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ का उपयोग वर्जित होता है। टिमरू की छाल से तैयार औषधीय पाउडर केवल कुछ समय के लिए ही पानी में ऑक्सीजन के स्तर को कम करके मछलियों को अचेत (बेहोश) करता है, जिससे उन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है। जो मछलियां पकड़ में नहीं आतीं, वे बहते पानी में कुछ समय बाद फिर से सामान्य हो जाती हैं। यही कारण है कि यह पारंपरिक पर्व जलीय जीवन चक्र को नुकसान पहुँचाए बिना संपन्न होता है।
मेले के दौरान जौनपुर और जौनसार क्षेत्र की समृद्ध लोक कला की सुंदर झलक देखने को मिली। नदी के दोनों किनारों पर पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं लोकगीत गाती रहीं, वहीं पुरुष और युवा ढोल की थाप पर थिरकते हुए नदी की लहरों के बीच मछलियां ढूंढते नजर आए। शाम को पकड़ी गई मछलियों को लेकर सभी ग्रामीण अपने-अपने गांवों को लौटे, जहाँ पारंपरिक भोज के साथ इस उत्सव का उल्लासपूर्वक समापन किया गया।
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