रुड़की :उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली कोसी नदी बेसिन पर आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर देखने को मिलेगा। आईआईटी रुड़की और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि सदी के अंत तक क्षेत्र के तापमान में भारी बढ़ोतरी होगी और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में 20% से अधिक की गिरावट आ सकती है। इससे पेयजल, खेती और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा संकट मंडरा सकता है।
यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘थियोरेटिकल एंड एप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी’ (Theoretical and Applied Climatology) में प्रकाशित हुआ है।
यह रिसर्च आईआईटी रुड़की के डॉ. बी. दास, डॉ. एस. सेन और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने मिलकर की है। वैज्ञानिकों ने 5 वैश्विक जलवायु मॉडल्स के अनुमानों को ‘सॉइल एंड वाटर असेसमेंट टूल’ (SWAT) मॉडल के साथ जोड़कर कोसी नदी बेसिन के जलवैज्ञानिक चक्र (Hydrological Cycle) पर संभावित असर का सटीक आकलन किया है।
पहाड़ी क्षेत्रों में आबादी मुख्यतः नौले, धारे और प्राकृतिक चश्मों पर निर्भर करती है। अध्ययन में आगाह किया गया है कि भविष्य में सूखे की घटनाएं न केवल बार-बार होंगी, बल्कि अधिक लंबे समय तक खिंच सकती हैं। इससे स्थानीय समुदायों की पेयजल आपूर्ति और फसलों की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
“जलवायु परिवर्तन पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की जल सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस प्रकार के वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं को ठोस डेटा के आधार पर दीर्घकालिक नीतियां और अनुकूलन रणनीतियां तैयार करने में मदद करते हैं।”— प्रो. कमल किशोर पंत, निदेशक, IIT रुड़की
“यह अध्ययन हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों की जल प्रणाली में बड़े बदलाव का संकेत देता है। बढ़ते तापमान से पानी का वाष्पीकरण बढ़ेगा और भूजल रीचार्ज घटेगा। इससे निपटने के लिए सक्रिय अनुकूलन उपायों और विज्ञान-आधारित जल प्रबंधन को अपनाना बेहद जरूरी है।”— डॉ. आई.डी. भट्ट, निदेशक, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान
वैज्ञानिकों ने कोसी नदी बेसिन को बचाने के लिए नीतिगत स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने पर जोर दिया है:
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