मुख्य बिंदु :
- सीमित अनुमति: 1 अगस्त से लिपुलेख दर्रे के जरिए सिर्फ 20 व्यापारी/सहायक ही जा सकेंगे तकलाकोट।
- नए माल पर पाबंदी: व्यापारी अपने साथ नया सामान नहीं ले जा सकेंगे, केवल पुराना फंसा सामान देखने/लाने की इजाजत।
- करोड़ों का नुकसान: 45 व्यापारियों का 1 करोड़ से अधिक का माल पिछले 6 सालों से तकलाकोट में फंसा।
- तैयारियां धरी की धरीं: भारत की ओर से कस्टम ऑफिस (गुंजी) और पास की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद चीन का अड़ंगा।

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) | :उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित ऐतिहासिक लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन (तिब्बत) के बीच सीमा व्यापार (Border Trade) फिर से शुरू होने की उम्मीदों को झटका लगा है। कोरोना महामारी के चलते करीब 6 साल से ठप पड़े इस पारंपरिक व्यापार को शुरू करने के लिए चीनी अधिकारियों ने एक नया पेंच फंसा दिया है। चीनी प्रशासन ने आगामी 1 अगस्त से केवल 20 भारतीय व्यापारियों और उनके सहायकों को ही सीमा पार तिब्बत की तकलाकोट (पुरंग) मंडी जाने की अनुमति दी है।
हैरानी की बात यह है कि ये व्यापारी अपने साथ कोई नया सामान नहीं ले जा सकेंगे। चीन ने स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं व्यापारियों को प्रवेश मिलेगा, जिनकी दुकानें पहले से तकलाकोट में स्थापित हैं या जिनका सामान वहां फंसा हुआ है।
चीन से आया ई-मेल, एसडीएम ने मांगी 27 जुलाई तक सूची
धारचूला के एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि चीन सरकार के पुरंग काउंटी कार्यालय के पार्टी लीडरशिप ग्रुप निदेशक लुओसांग ने ई-मेल भेजकर 1 अगस्त से चीन सीमा में प्रवेश की पुष्टि की है।
“चीन प्रशासन की ओर से मिले संदेश के अनुसार, पहले दल में केवल वही 20 व्यापारी और सहायक शामिल होंगे, जिनकी दुकानें या सामान बीते सालों से तकलाकोट मंडी में रखा हुआ है। इसके लिए भारत-चीन व्यापार समिति से 27 जुलाई तक पात्र व्यापारियों की सूची मांगी गई है, जिसे अंतिम रूप देकर चीन को भेजा जाएगा।”— आशीष जोशी, एसडीएम (धारचूला)
तकलाकोट में फंसा है 1 करोड़ से अधिक का सामान
साल 2019 (कोरोना काल) में जब अचानक व्यापार बंद हुआ, तो भारतीय व्यापारी अपनी दुकानों का सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़कर लौटने पर मजबूर हो गए थे। पिछले 6 सालों से करीब 45 भारतीय व्यापारियों का 1 करोड़ रुपये से अधिक का सामान वहां अटका हुआ है। इस बार व्यापार शुरू होने से व्यापारियों को अपना फंसा हुआ सामान वापस लाने और नया व्यापार करने की उम्मीद थी, लेकिन चीन के रुख से उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
व्यापारियों में भारी निराशा, गुंजी तक पहुंचा दिया था सामान
चीन के इस अचानक फैसले से भारतीय व्यापारियों में गहरी निराशा और नाराजगी है। भारत-चीन व्यापार समिति के महासचिव डीएस रायपा ने बताया कि 1 जून से धारचूला में व्यापार पास जारी किए गए थे और व्यापारियों व 92 सहायकों को पास मिल चुके थे।
व्यापारियों ने जून के अंत तक अपना सामान ऊपरी पड़ावों जैसे गुंजी और कस्टम कार्यालय तक पहुंचा भी दिया था। रायपा के अनुसार, अब चीन की ओर से केवल 20 पुराने व्यापारियों को बिना नए सामान के बुलाने से पूरी व्यवस्था ही बिगड़ गई है। अनुमति पाने वाले 20 व्यापारियों में से भी छंटनी होने की आशंका जताई जा रही है।
लिपुलेख से सदियों पुराना है व्यापारिक संबंध
- पारंपरिक व्यापार: पिथौरागढ़ के लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और तिब्बत के बीच सदियों से वस्तु-विनिमय और पारंपरिक व्यापार होता रहा है।
- 1962 में बंदी: भारत-चीन युद्ध के बाद 1962 में यह व्यापार पूरी तरह बंद हो गया था।
- 1992 में पुनरुत्थान: 30 साल बाद, 1992 में तकलाकोट मंडी के जरिए इसे दोबारा शुरू किया गया।
- 2019 में फिर रुका: कोरोना महामारी और सीमा तनाव के बीच 2019 में इसे फिर स्थगित कर दिया गया। अब 6 साल बाद इसे शुरू करने की कोशिशों में अड़चनें बनी हुई हैं।
