आस्था की तिजोरी पर अपनों का डाका "ठगे गए राम, ठगी आवाम"

रामलला के दरबार में चढ़ावे की चोरी का ऐसा सनसनीखेज सच, जिसने भगवान का कोष भी लूटा और करोड़ों भक्तों का भरोसा भी तोड़ा
"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
अयोध्या में देश-दुनिया के करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं ने जिस अगाध श्रद्धा के साथ अपने आराध्य प्रभु श्री राम के चरणों में अपनी गाढ़ी कमाई और जीवन भर की पूंजी समर्पित कर दी। उसी पावन कोष को अपनों के ही 'लालच की दीमक' चाट रही थी। अयोध्या के भव्य राम मंदिर परिसर में सामने आया 'चढ़ावा चोरी प्रकरण' सिर्फ एक वित्तीय हेरफेर नहीं, बल्कि इस देश की आत्मा और जनता की आस्था के साथ किया गया एक अक्षम्य विश्वासघात है। सचमुच, यहां 'राम' भी ठगे गए और देश की 'आवाम' भी ठगी गई।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व की जड़ों को हिलाकर रख देने वाले इस महाघोटाले की स्क्रिप्ट किसी बाहरी जेबकतरे या पेशेवर डकैत ने नहीं, बल्कि ट्रस्ट के ही सबसे भरोसेमंद चेहरों ने लिखी थी। विशेष जांच दल (SIT) की तफ्तीश में जो सच बाहर आया है, उसने हर रामभक्त को मर्माहत कर दिया है। ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के निजी ड्राइवर 'टिन्नू यादव' की सरपरस्ती में चल रहे इस सिंडिकेट ने मंदिर परिसर के सीसीटीवी 'ब्लाइंड स्पॉट्स' का फायदा उठाकर रोजाना लाखों रुपये उड़ाए।
इस घिनौने खेल की सबसे वीभत्स तस्वीर तब सामने आई, जब एसआईटी ने छापेमारी की। श्रद्धालुओं द्वारा प्रभु के चरणों में चढ़ाई गई नोटों की गड्डियां, आरोपियों के घरों में गाय के गोबर के उपलों और अलमारियों के गुप्त खानों में दफन मिलीं। चूंकि गिरोह में शामिल अधिकांश लोग पेशेवर बैंककर्मी थे, इसलिए उन्होंने ऑडिट को चकमा देने के लिए बाकायदा 'बैंकिंग लूपहोल्स' का इस्तेमाल किया।
इस खुलासे की आंच इतनी तेज थी कि नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा। पुलिस अब तक करीब 80 लाख रुपये कैश बरामद कर 8 मास्टरमाइंड्स को जेल भेज चुकी है, लेकिन विपक्षी दलों के 200 करोड़ के दावों के बीच SIT अब भी 50 से अधिक संदिग्धों के बैंक खातों और कुंडली को खंगाल रही है। पढ़िए, आस्था की तिजोरी में लगी इस सेंधमारी की परत-दर-परत पूरी कहानी...
"प्रभु श्री राम के पावन धाम और जन-जन की आस्था के केंद्र में इस प्रकार का कुकृत्य अक्षम्य है। श्रद्धालुओं की श्रद्धा और रामलला के कोष के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। चाहे वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो, सरकार उसके खिलाफ ऐसी कठोरतम कानूनी कार्रवाई करेगी जो आने वाले समय के लिए एक मिसाल बनेगी। — योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश"
जानिए 5 जून से 26 जून तक की पूरी कहानी
अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में दर्ज एफआईआर और विशेष जांच दल (SIT) की तफ्तीश के मुताबिक, इस पूरे खेल का घटनाक्रम कुछ इस प्रकार रहा:-
साजिश का पर्दाफाश (औचक निरीक्षण)
05 जून
ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों को गुप्त सूचना मिली कि दानपात्रों और यात्री सुविधा केंद्र (PFC) में होने वाली नोटों की गिनती में हेरफेर हो रहा है। पदाधिकारियों ने यात्री सुविधा केंद्र का औचक निरीक्षण किया। नोटों की गिनती कर रहे कुछ कर्मचारियों की ऑन-स्पॉट तलाशी ली गई, तो उनके पास से भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ। मामला दबाने की कोशिश हुई, लेकिन चिंगारी सुलग चुकी थी।
राजनीतिक विस्फोट और अखिलेश यादव का हमला
07 जून
समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राम मंदिर के दानपात्रों से 5 करोड़ से 7.5 करोड़ रुपये की चोरी का सीधा आरोप लगाया। उसी शाम सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने 'X' (ट्विटर) पर पोस्ट कर सरकार और ट्रस्ट को घेरा। इसके बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने आनन-फानन में सफाई जारी की।
दिल्ली में हलचल और PMO का दखल
10 जून
मामला जब राष्ट्रीय स्तर पर गरमाया तो प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की। मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र तत्काल दिल्ली से अयोध्या पहुंचे और बंद कमरे में 4 घंटे तक मैराथन बैठक की।
वीडियो लीक और 'डिलीट फुटेज' का दावा
11 जून
ट्रस्ट के पूर्व अकाउंटेंट महिपाल सिंह का एक वीडियो सामने आया। उन्होंने सनसनीखेज दावा किया कि साल 2021-2022 में भी उन्होंने ऐसी ही चोरी पकड़ी थी, लेकिन तब साक्ष्यों और 8 महीने के सीसीटीवी फुटेज को डिलीट कर दिया गया था।
यूपी सरकार द्वारा SIT का गठन
13 जून
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद, ट्रस्ट के लिखित अनुरोध पर यूपी सरकार ने 3 सदस्यीय हाई-लेवल SIT का गठन किया। इसमें लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस. और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल किए गए।
SIT की मैराथन पूछताछ और छापेमारी
15-20 जून
एसआईटी ने अयोध्या में 6 दिनों तक डेरा डाला। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और व्यवस्थापक गोपाल राव से कई घंटों तक पूछताछ की गई। नोटों की गिनती से जुड़े 50 कर्मचारियों को रडार पर लेकर पूछताछ शुरू हुई। आरोपियों के ठिकानों पर छापेमारी में गोबर के ढेर और बक्सों से नोट बरामद हुए।
औपचारिक FIR और 8 मास्टरमाइंड गिरफ्तार
25-26 जून
SIT की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की तहरीर पर राम जन्मभूमि थाने में औपचारिक एफआईआर दर्ज हुई। पुलिस और एसआईटी ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी टिन्नू यादव समेत सभी 8 नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। विशेष रिमांड मजिस्ट्रेट की अदालत ने सभी को 29 जून तक न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
आरोपियों की प्रोफाइल और उनका रोल
इस पूरे स्कैम की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें शामिल अधिकांश लोग बाहरी जेबकतरे नहीं थे, बल्कि वे लोग थे जिन्हें ट्रस्ट ने बेहद भरोसे के साथ 'रामलला के खजाने' की रखवाली और गिनती का जिम्मा सौंपा था। गिरफ्तार किए गए 8 आरोपियों में से 5 से 6 लोग पेशेवर बैंक कर्मचारी या रिटायर्ड बैंककर्मी हैं।
आरोपी का नाम प्रोफाइल/पेशा इस घोटाले में रोल
रमाशंकर उर्फ टिन्नू यादव
ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय का निजी ड्राइवर मुख्य सूत्रधार (किंगपिन)
चंपत राय के करीब होने के कारण इसकी परिसर में असीमित पहुंच थी। इसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने रिश्तेदारों और करीबियों को नोटों की गिनती के काम में लगवाया और चोरी का सिंडिकेट चलाया।
मनीष कुमार यादव,
टिन्नू यादव का सगा भतीजा कैश काउंटर संचालक
चाचा टिन्नू यादव के प्रभाव से इसे नोटों की गिनती की कोर टीम में एंट्री मिली। यह गुप्त दान में आने वाले सोने-चांदी के आभूषणों और बड़े नोटों की हेराफेरी का सीधे तौर पर दोषी पाया गया। इसके पास से सबसे बड़ी रिकवरी हुई।
लवकुश मिश्रा
बैंक कर्मचारी/काउंटिंग स्टाफ चोरी का एग्जीक्यूटर
मंदिर में मिलने वाले कैश को गिनने के दौरान चालाकी से गड्डियों में से नोट गायब करता था। ट्रस्ट की आंतरिक पूछताछ में इसके घर से नोटों की बरामदगी हुई।
अनुकल्प मिश्रा
लवकुश मिश्रा का सगा बहनोई सह-साजिशकर्ता
लवकुश के साथ मिलकर नकदी और कीमती सामान की गिनती में हेरफेर करता था और चोरी किए गए कैश को ठिकाने लगाने का काम करता था।
अविनाश शुक्ला
काउंटिंग टीम का सदस्य/बैंककर्मी
नोटों की गिनती के दौरान सीसीटीवी कैमरों की नजरों से बचकर रकम को छुपाने और उसे परिसर से बाहर भेजने के सिंडिकेट का सक्रिय हिस्सा।
करुणेश पांडेय
काउंटिंग स्टाफ
ऑडिट और गणना प्रक्रिया के दौरान खातों और भौतिक कैश के मिलान में जानबूझकर विसंगतियां पैदा करता था ताकि चोरी पकड़ी न जा सके।
रमा शंकर मिश्र
काउंटिंग स्टाफ/ बैंककर्मी
दैनिक चढ़ावे की गिनती के दौरान नकदी के बंडलों से नोटों की चोरी करने और उसे टिन्नू यादव के नेटवर्क तक पहुंचाने में शामिल।
सुभाष श्रीवास्तव
रिटायर्ड बैंक कर्मचारी रणनीतिकार
बैंकिंग नियमों और लूपहोल्स की गहरी समझ होने के कारण इसने पूरी टीम को यह गाइड किया कि ऑडिट में पकड़े बिना रोजाना कितनी रकम गायब की जा सकती है। हालांकि इसके पास से सीधे कैश बरामद नहीं हुआ, लेकिन इसे मुख्य साजिशकर्ता माना गया है।
अब तक की अपडेट्स और रिकवरी
पुलिस और एसआईटी द्वारा कोर्ट में पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, अब तक इस मामले में निम्नलिखित बड़ी कार्रवाइयां हो चुकी हैं।
करीब 80 लाख की रिकवरी:- पुलिस अब तक आरोपियों के पास से और उनके ठिकानों से कुल 79.85 लाख रुपये की नकद बरामदगी कर चुकी है। इसके अलावा मनीष यादव के घर के पास से चोरी का सोना भी बरामद किया गया है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं:- पुलिस ने इन आरोपियों पर केवल सामान्य चोरी (Theft) का मुकदमा दर्ज नहीं किया है। चूंकि इनमें से कई लोक सेवक (बैंक कर्मचारी) की भूमिका में थे और राम मंदिर ट्रस्ट का काम संभाल रहे थे, इसलिए इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की सख्त धाराएं जोड़ी गई हैं। इसके साथ ही भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक विश्वासघात और साजिश की धाराएं भी लगाई गई हैं।
इस्तीफों का दौर और अंदरूनी रार:- इस घोटाले की सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक गाज राम मंदिर ट्रस्ट के शीर्ष पर गिरी है। मुख्य आरोपी टिन्नू यादव के सीधे जुड़ाव के कारण, नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इस घटना के बाद से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और नृपेंद्र मिश्र की अगुवाई वाली मंदिर निर्माण समिति के बीच दूरियां और कड़वाहट बेहद बढ़ गई हैं। नृपेंद्र मिश्र के सख्त तेवरों से अयोध्या से लेकर लखनऊ तक खलबली मची हुई है।
"कैसे होती थी आस्था की तिजोरी में सेंधमारी?"
"एसआईटी की जांच में जो तरीका सामने आया है। उसने सुरक्षा एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं। राम मंदिर जैसे अति-सुरक्षित और सीसीटीवी कैमरों से लैस परिसर में यह चोरी लंबे समय से बेहद शातिराना अंदाज में चल रही थी।"
"साजिश का 'बैंकिंग' पैटर्न:- चूंकि गिरोह में शामिल अधिकांश लोग बैंक कर्मचारी थे, इसलिए उन्हें अच्छी तरह पता था कि नोटों के बंडलों की गिनती के दौरान किस तरह से 'शॉर्टिंग' की जाती है। वे रोजाना लाखों रुपये के चढ़ावे में से कुछ हजार या लाख रुपये की गड्डियां अलग कर लेते थे।"
"ब्लाइंड स्पॉट्स का फायदा:- यात्री सुविधा केंद्र और गणना कक्ष में जहां सीसीटीवी कैमरों का कवरेज कमजोर था या जहां 'ब्लाइंड स्पॉट' बनते थे, वहां बैठकर नोटों को कपड़ों और जूतों में छुपाया जाता था।"
"गोबर के ढेर में छिपाया खजाना:- जब ट्रस्ट के पदाधिकारियों और एसआईटी ने छापेमारी की, तो आरोपियों के घरों से बेहद अजीबोगरीब जगहों से पैसे मिले। आरोपी लवकुश और अनुकल्प मिश्रा के घर पर छापेमारी के दौरान पुलिस ने गाय के गोबर के उपलों और ढेर के नीचे प्लास्टिक में लपेटकर छिपाकर रखी गई नकदी बरामद की। इसके अलावा बक्सों और अलमारियों के गुप्त खानों से भी नोट मिले।"
"सोने-चांदी का हेरफेर:- मनीष यादव और केडी तिवारी के पास गुप्त दान में आने वाले सोने-चांदी के जेवर संभालने की जिम्मेदारी थी। जांच में पता चला है कि कीमती धातुओं के वजन और उनकी शुद्धता के रिकॉर्ड में भी भारी हेरफेर किया जा रहा था।"
मामले में अब आगे क्या?
यह घोटाला सिर्फ 80 लाख रुपये या इन 8 लोगों तक सीमित नहीं है। विपक्षी दलों का दावा है कि यह घोटाला 200 करोड़ रुपये से अधिक का हो सकता है। क्योंकि रामलला के दर्शन के लिए रोजाना आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के गुप्त दान का कोई सटीक डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
SIT सूत्रों का कहना है कि नोटों की गिनती और प्रबंधन से जुड़े लगभग 50 अन्य कर्मचारी अभी भी रडार पर हैं। एसआईटी इनकी कॉल डिटेल्स, बैंक खातों के लेन-देन और पिछले एक साल के भीतर इनकी संपत्ति में हुए अचानक इजाफे की जांच कर रही है। 29 जून को जब इन सभी आरोपियों को दोबारा कोर्ट में पेश किया जाएगा, तब पुलिस इनकी कस्टोडियॉल रिमांड मांगेगी, जिसके बाद पूछताछ में कई और बड़े चेहरों और अयोध्या के कुछ रसूखदार सफेदपोशों के नाम सामने आ सकते हैं।
वो सुलगते सवाल, जिनका जवाब देश की जनता और करोड़ों रामभक्त आज सरकार और ट्रस्ट के जिम्मेदार चेहरों से मांग रही है।
1. सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में करोड़ों की चोरी कैसे मुमकिन हुई?
राम मंदिर परिसर देश के सबसे सुरक्षित और हाई-टेक सर्विलांस जोन में से एक है। चप्पे-चप्पे पर आधुनिक सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। जनता जानना चाहती है कि महीनों तक इन कैमरों के सामने नोटों की गड्डियां गायब की जाती रहीं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों, कंट्रोल रूम और विजिलेंस टीम की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? क्या जानबूझकर इन 'ब्लाइंड स्पॉट्स' को अनदेखा किया गया?
2. ट्रस्ट के महासचिव के ड्राइवर को 'खजाने' तक पहुंच किसने दी?
एक निजी ड्राइवर (टिन्नू यादव) का काम गाड़ी चलाना होता है। सवाल यह है कि उसे मंदिर के यात्री सुविधा केंद्र और नोटों की गिनती वाले अति-संवेदनशील कोर-रूम में दाखिल होने की अनुमति किसने दी? इतना ही नहीं, उसने अपने प्रभाव से अपने रिश्तेदारों और बैंककर्मियों की पूरी टीम को काउंटिंग स्टाफ में भर्ती करवा दिया। इस 'नेपोटिज़्म' और सुरक्षा चूक के लिए असली जिम्मेदार कौन है?
3. क्या वाकई 2021-22 में सबूत और सीसीटीवी फुटेज डिलीट किए गए थे?
ट्रस्ट के पूर्व लेखापाल महिपाल सिंह ने वीडियो जारी कर दावा किया कि उन्होंने साल 2021-22 में भी ऐसी ही चोरी पकड़ी थी, लेकिन तब 8 महीने के सीसीटीवी फुटेज और सबूतों को मिटाकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया। जनता पूछ रही है कि अगर यह दावा सच है, तो उस वक्त इस चेतावनी को क्यों दबाया गया? अगर तब कार्रवाई हो जाती, तो आज यह दिन न देखना पड़ता।
4. अब तक कितनी रकम गायब हुई, इसका सटीक आंकड़ा क्या है?
पुलिस ने अब तक करीब 80 लाख रुपये की रिकवरी की है, लेकिन विपक्ष और आम जनता का अंदेशा है कि यह घोटाला कहीं बड़ा हो सकता है। मंदिर के उद्घाटन के बाद से रोजाना लाखों लोग आ रहे हैं और करोड़ों का गुप्त दान (कैश और सोना-चांदी) आ रहा है। चूंकि शुरुआती महीनों में दान का कोई मुकम्मल डिजिटल या बारकोड आधारित रिकॉर्ड नहीं था, तो यह कैसे तय होगा कि वास्तव में तिजोरी से कितने करोड़ साफ किए गए?
5. दान की व्यवस्था में 'पारदर्शिता' कब आएगी?
करोड़ों भक्त अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया रामलला के चरणों में समर्पित करते हैं। इस घटना ने उनके भरोसे को गहरी ठेस पहुंचाई है। आवाम का सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में ऐसी किसी भी 'सेंधमारी' को रोकने के लिए ट्रस्ट क्या कदम उठा रहा है? नोटों की गिनती के लिए कोई लाइव-स्ट्रीमिंग, डिजिटल ऑडिट या किसी तीसरे पक्ष की निगरानी व्यवस्था लागू क्यों नहीं की जा रही है?
"हम आहत और स्तब्ध हैं..."
"पिछले कुछ दिनों से राम मंदिर परिसर में सामने आईं दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से पूरा न्यास स्तब्ध और आहत है। करोड़ों भक्तों की आस्था के केंद्र में इस तरह की लापरवाही या हेरफेर कतई स्वीकार्य नहीं है। चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा प्राप्त हो चुका है। चूंकि मामला बेहद संवेदनशील है, इसलिए ट्रस्ट की आगामी आपातकालीन बैठक में इन इस्तीफों पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा और नए पदाधिकारियों की घोषणा की जाएगी। साथ ही, श्रद्धालुओं के टूटते भरोसे को थामने के लिए ट्रस्ट ने आश्वस्त किया है कि भक्तों द्वारा अर्पित की गई चांदी की ईंटें, सोने के आभूषण और अन्य कीमती सामान पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनके पास एक-एक पाई का भौतिक और डिजिटल हिसाब मौजूद है। - स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज, कोषाध्यक्ष, ट्रस्ट"
आस्था का चढ़ावा और लालच की डकैती
"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
यह देश भी अजीब है। यहां पत्थरों में प्राण फूंकने वाले तो करोड़ों हैं। लेकिन, अपनी मरी हुई आत्मा को जिंदा करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। रामलला अपनी जगह मुस्कुरा रहे हैं। और उनके ठीक नीचे इंसान अपनी औकात दिखा रहा है।
अयोध्या में राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं है। वह इस देश की सनातन चेतना का सबसे बड़ा प्रतीक है। लेकिन कुछ लोगों के लिए वह सिर्फ एक 'नया मार्केट' है, जहां भीड़ भी है। पैसा भी है। सबसे बड़ी बात चोरी करने के लिए 'आस्था का कवर' भी है। मंदिर के दानपात्रों से, भक्तों की गाढ़ी कमाई के 'चढ़ावे' में हेरफेर होना सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है। यह नैतिक कंगाली का आखिरी सिरा है।
जब घर की तिजोरी से धन गायब होता है, तो जवाबदेही तिजोरी की नहीं, चाबी रखने वाले मुखिया की होती है। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय जी, जनता आपसे सवाल पूछ रही है। जब जमीनों के सौदों में 'जादुई' खेल हुआ। जब चढ़ावे के करोड़ों रुपये के हेरफेर के आरोप लगे, तब आपकी वो बुलंद आवाज कहां खो गई थी, जो कभी टीवी कैमरों पर गूंजती थी?
विपक्ष और जनता जब चंपत राय के इस्तीफे की मांग कर रही है, तो वह सिर्फ एक पद की मांग नहीं है। वह इस बात का गुस्सा है कि राम के नाम पर इकट्ठा हुए पैसे और भक्तों की पवित्र आस्था पर दाग कैसे लग गया?
आरोप लगे तो चंपत राय को खुद आगे आकर कहना चाहिए था कि जब तक चढ़ावे और पाई-पाई के हिसाब की जांच पूरी नहीं होती, मैं इस पवित्र काम से दूर रहता हूं। लेकिन नहीं, यहां कुर्सी और रसूख का गोंद इतना मजबूत है कि मर्यादा पीछे छूट जाती है और पद ऊपर हो जाता है।
राम मंदिर का काम किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं है। अगर चढ़ावे के प्रबंधन और मुखिया की नीयत पर ही उंगली उठ जाए, तो मंदिर की भव्यता फीकी पड़ने लगती है। इस्तीफा न देना यह दिखाता है कि आपके लिए संगठन का अहंकार, राम की मर्यादा से बड़ा हो गया है। जब आम आदमी मंदिर जाता है, तो उसे तीन किलोमीटर दूर धूप में तपाया जाता है। उसकी जेब, उसका बेल्ट, उसका मोबाइल, सब ऐसे चेक किया जाता है जैसे वह अंतरराष्ट्रीय तस्कर हो। लेकिन जब मंदिर के भीतर ही भक्तों के चढ़ावे, सोने-चांदी के उपहारों और चंदे में हेरफेर होता है, तब सीसीटीवी कैमरे किधर मुंह करके सो रहे होते हैं?
यह वीआईपी मैनेजमेंट का सबसे घटिया नमूना है।
सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी पर न मार सके। नीयत ऐसी कि भीतर बैठा चूहा दानपात्र को कुतर जाए, और ट्रस्ट के सिपहसालार शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गाड़कर बैठे रहें।
परेशानी उन चढ़ावा चोरों से उतनी नहीं है, जितनी हमारी सामूहिक चुप्पी और रक्षक बने बैठे लोगों की ढीटता से है। हम उस दौर में जी रहे हैं, जहां भगवान को तो इंसाफ चाहिए, लेकिन इंसान को सिर्फ 'पावर' और 'पोजीशन' चाहिए। मंदिर बन गया। भव्यता आ गई। करोड़ों का चढ़ावा आ गया, बधाई हो। लेकिन उस भव्यता के पीछे जो नैतिक सड़न रेंग रही है, उसे कौन सा गंगाजल धोएगा? अगर राम के दरबार में भक्तों की श्रद्धा का 'चढ़ावा' सुरक्षित नहीं है और जिम्मेदार लोग अपनी कुर्सियों से चिपके हुए हैं, तो समझ लीजिए कि गायब धन नहीं हुआ है, गायब इस देश का चरित्र हुआ है।
"चढ़ावा चोरों को तो पुलिस पकड़ लेगी। लेकिन, उन सफेदपोशों का क्या करोगे जो राम के नाम की आड़ में अपनी तिजोरियां और अपनी साख चमका रहे हैं? राम को रावण से खतरा कभी नहीं था। राम को खतरा हमेशा 'विभीषणों' से रहा है, जो भीतर बैठकर लंका ढहाते हैं और खुद को रामभक्त बताते हैं।"
