शरीर का 'सॉफ्टवेयर' अपडेट करने का वक्त

शरीर का 'सॉफ्टवेयर' अपडेट करने का वक्त
सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA
तय मानिए, अगर आपका शरीर आपके साथ नहीं है, तो आपकी तिजोरी में रखा सोना सिर्फ एक पीली धातु है। हम उस दौर में जी रहे हैं, जहां अस्पताल मॉल की तरह चमक रहे हैं और इंसान मोमबत्ती की तरह पिघल रहा है।
7 अप्रैल को 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' है। औपचारिकता निभानी हो तो सोशल मीडिया पर कोई कोट डाल दीजिए। लेकिन, अगर सच का सामना करना है, तो खुद की आंखों में आंखें डालकर पूछिए, क्या आप वाकई जी रहे हैं, या सिर्फ सांसों का हिसाब रख रहे हैं?
मशीन फिट और शरीर अनफिट। ये अजीब विडंबना है। हम अपनी कार की सर्विसिंग समय पर कराते हैं। मोबाइल का सॉफ्टवेयर अपडेट होते ही तुरंत इंस्टॉल करते हैं। लेकिन जिस देह के सहारे यह पूरी दुनिया देख रहे हैं, उसका 'सॉफ्टवेयर' वायरस से भरा पड़ा है। हम भूल गए हैं कि शरीर कोई वेटिंग रूम नहीं है, जहां कचरा (जंक फूड) जमा किया जाए।
सच यह है कि हम एक ऐसे कब्रिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके पत्थर हमने खुद तराशे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट देखिए। दुनिया की 74% मौतें युद्ध या महामारी से नहीं, बल्कि हमारी खराब जीवनशैली से हो रही हैं। इसका मतलब साफ है, हम मारे नहीं जा रहे। बल्कि हम 'आत्महत्या' कर रहे हैं।
ICMR के आंकड़े बताते हैं कि भारत 'डायबिटीज की राजधानी' बन चुका है। हर चौथा भारतीय बीपी या शुगर की गिरफ्त में है। यह कोई डेटा नहीं है। यह हमारे भविष्य की अर्थी का मसौदा है। 30 साल का युवक हार्ट अटैक से दम तोड़ रहा है और हम इसे 'वर्क प्रेशर' का नाम देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। हकीकत यह है कि हमने अपनी सेहत को तकनीक के हाथों गिरवी रख दिया है।
अस्पतालों की चमक बढ़ रही है, क्योंकि हमारे शरीर की चमक फीकी पड़ रही है। अगर इन आंकड़ों को पढ़ने के बाद भी आप कल सुबह की सैर पर नहीं निकले, तो मान लीजिए कि आप अपनी बर्बादी के दस्तावेज़ पर खुद हस्ताक्षर कर रहे हैं।
आज हमने अपनी रातों को मोबाइल स्क्रीन के नाम कर दिया है। सुकून को 'सफलता' की दौड़ में गिरवी रख दिया है। स्वाद की गुलामी में हमने पोषण का गला घोंट दिया है। आजकल ड्राइंग रूम में सजावट के सामान से ज्यादा दवाइयों के डिब्बे नजर आते हैं। 30 की उम्र में बीपी और 40 में शुगर। क्या ये हमारी उपलब्धि है? नहीं, ये हमारी जीवनशैली की हार है। हम अपने बच्चों को 'विटामिन' की गोलियां खिला रहे हैं। क्योंकि हमने उन्हें धूप और मिट्टी से दूर कर दिया है। याद रखिए, स्वास्थ्य किसी मेडिकल स्टोर पर बिकने वाली वस्तु नहीं है, यह तो अनुशासन की कोख से पैदा होने वाला सुख है।
हम अस्पताल का बिल चाहते हैं या फिर सुबह की सैर? ये हमें तय करना है। आज सुबह की ताजी हवा में आधा घंटा निवेश कर लीजिए, या कल किसी आलीशान अस्पताल के आईसीयू में लाखों का बिल चुकाने के लिए तैयार रहिए। बीमारी सिर्फ शरीर को नहीं तोड़ती, वह पूरे परिवार की रीढ़ तोड़ देती है।
स्वास्थ्य कोई 'डे' मनाने का विषय नहीं है। यह हर दिन खुद को जीतने का संकल्प है। अगर आप खुद के लिए वक्त नहीं निकाल सकते, तो यकीन मानिए, आपने अभी तक जीना शुरू ही नहीं किया है।
परिवर्तन की शुरुआत आज से करिए, क्योंकि जब तक सांस है, तभी तक आस है।
