UTTARAKHAND

वन्यजीव संरक्षण के साथ विकास: 743 करोड़ से बनेगा 20 किमी लंबा भानियावाला-ऋषिकेश हाईवे, हाथियों के लिए बनेंगे 5 अंडरपास और 3.5 किमी का एलिवेटेड मार्ग

देहरादून,: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) उत्तराखंड में भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना (NH-07) को गति दे रहा है. लगभग 20 किलोमीटर लंबे इस राजमार्ग को न केवल तेज और सुरक्षित यातायात के लिए तैयार किया जा रहा है, बल्कि इसमें पर्यावरण और वन्यजीवों के संरक्षण को भी विशेष प्राथमिकता दी गई है. हाइब्रिड एन्युटी मोड (HAM) के तहत ₹743 करोड़ की लागत से बनने वाले इस हाईवे से देहरादून, जॉलीग्रांट हवाई अड्डे और ऋषिकेश के बीच सुगम संपर्क स्थापित हो सकेगा.

खबर एक नजर में :

  • सुरक्षित मार्ग: भानियावाला-ऋषिकेश के बीच 20 किमी लंबी फोर-लेन सड़क से यात्रा सुरक्षित और सुगम होगी.
  • हाथियों की सुरक्षा: हाथियों के सुरक्षित पारगमन के लिए करीब 3.5 किमी लंबी एलिवेटेड संरचना और 5 विशेष अंडरपास बनेंगे.
  • वन संरक्षण: वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई न्यूनतम करने के लिए ‘राइट ऑफ वे’ (ROW) को 60 मीटर से घटाकर केवल 23 मीटर किया गया.
  • पेड़ों का प्रतिरोपण: एफआरआई (FRI) के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर 754 परिपक्व पेड़ों को काटने के बजाय अन्य स्थानों पर ट्रांसप्लांट किया जाएगा.
  • इको-फ्रेंडली फीचर्स: हाईवे पर साउंड बैरियर, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन और नो-हॉर्न जोन की विशेष व्यवस्था रहेगी.

हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए 3.5 किमी एलिवेटेड कॉरिडोर

यह राजमार्ग शिवालिक एलीफेंट कॉरिडोर के संवेदनशील वन क्षेत्र के समीप से होकर गुजरता है. एनएचएआई के अनुसार, हाथियों के प्राकृतिक मार्ग को बाधित होने से बचाने के लिए राजमार्ग में लगभग 3.5 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड (उठी हुई) सड़क का निर्माण किया जाएगा।

इस परियोजना में वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही के लिए:

  • 1 प्रमुख ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास
  • 4 समर्पित एलीफेंट अंडरपास
  • इसके साथ ही, जानवरों को हाईवे पर आने से रोकने के लिए ग्रीन गाइड हेज विकसित की जाएगी।

‘नो हॉर्न’ जोन और साउंड बैरियर से वन्यजीवों को मिलेगी राहत

उत्तराखंड वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया (WWF-India) और डब्ल्यूआईआई (WII) देहरादून के तकनीकी परामर्श के आधार पर हाईवे पर वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कई आधुनिक प्रबंध किए गए हैं:

  • साउंड बैरियर और एंटी-ग्लेयर स्क्रीन: गाड़ियों के शोर और तेज रोशनी से जंगली जानवर विचलित न हों, इसके लिए विशेष स्क्रीन और साउंड बैरियर लगाए जा रहे हैं।
  • चेतावनी संकेतक और गति सीमा नियंत्रण: संवेदनशील क्षेत्रों में ड्राइवरों को सतर्क करने के लिए चेतावनी संकेतक और गति सीमा नियंत्रण (स्पीड कैल्मिंग) के उपाय किए जाएंगे।
  • नो हॉर्न जोन: इस पूरे वन क्षेत्र के हिस्से को ‘नो हॉर्न’ जोन घोषित किया गया है।

पर्यावरण सुरक्षा: पेड़ों का होगा ट्रांसप्लांटेशन

इस परियोजना के अंतर्गत पेड़ों के नुकसान को कम करने के लिए एनएचएआई ने विशेष प्रयास किए हैं:

  • चौड़ाई की सीमा को कम किया गया: सामान्यतः राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 60 मीटर चौड़ा राइट ऑफ वे (ROW) लिया जाता है, लेकिन वन क्षेत्र में इसे केवल 23 मीटर तक सीमित किया गया है ताकि कम से कम पेड़ों को हटाना पड़े।
  • वैज्ञानिक प्रतिरोपण: फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर 754 पेड़ों को ट्रांसप्लांटेशन के लिए चिह्नित किया गया है। इन पेड़ों को काटने के बजाय आगामी मानसून के दौरान पूरी वैज्ञानिक पद्धति से अन्यत्र प्रतिरोपित (ट्रांसप्लांट) कर दिया जाएगा।

वर्तमान मार्ग पर बढ़ रहा था दबाव

एनएचएआई के अनुसार, वर्तमान में इस वन क्षेत्र से गुजरने वाले दो-लेन मार्ग पर प्रतिदिन लगभग 18,456 वाहनों का भारी दबाव रहता है। चारधाम यात्रा, जौलीग्रांट एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी और बढ़ते पर्यटन के चलते इस मार्ग का चौड़ीकरण आवश्यक हो गया था। फोर-लेन के निर्माण से सड़क की ज्यामिति (Geometry) में सुधार होगा, तीखे मोड़ खत्म होंगे और यात्रा बेहद सुरक्षित हो जाएगी।

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