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निर्जला एकादशी की पौराणिक व्रत कथा

निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी की व्रत कथा महाभारत काल और पांडवों से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं इस पावन व्रत की संपूर्ण और पौराणिक कथा:

पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में एक बार कुंती पुत्र भीमसेन ने परम ज्ञानी महर्षि वेदव्यास जी से एक गंभीर समस्या का समाधान मांगा।

भीमसेन की दुविधा

भीमसेन ने व्यास जी से कहा— “हे परम आदरणीय पितामह! मेरी माता कुंती, भ्राता युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी, सभी एकादशी के दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं और मुझसे भी व्रत रखने का आग्रह करते हैं। मैं भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर सकता हूँ, दान-पुण्य भी कर सकता हूँ, लेकिन भोजन के बिना एक समय भी रहना मेरे लिए अत्यंत कठिन है।”

भीम ने अपनी लाचारी बताते हुए आगे कहा— “पितामह! मेरे उदर (पेट) में ‘वृक’ नाम की अत्यंत तीव्र जठराग्नि (भूख शांत न होने वाली अग्नि) वास करती है। जब तक मैं भरपेट भोजन न करूँ, वह अग्नि शांत नहीं होती। इसलिए भूख मुझसे बिल्कुल सहन नहीं होती। आप कृपा करके मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक ही दिन करना पड़े और उसे करने से मुझे मोक्ष और स्वर्गलोक की प्राप्ति हो जाए।”

महर्षि वेदव्यास जी का समाधान

भीमसेन की व्याकुलता और प्रार्थना सुनकर महर्षि वेदव्यास जी ने कहा— “हे भीम! यदि तुम नरक से बचना चाहते हो और स्वर्ग के सुख की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें एकादशी के दिन भोजन का त्याग करना ही होगा।”

इस पर भीमसेन डर गए और कांपते हुए बोले— “महाराज! महीने में दो व्रत रखना तो मेरे लिए पूरी तरह असंभव है। कृपया मुझे कोई ऐसा मार्ग बताइए जिससे वर्ष में केवल एक दिन के नियम से ही मेरा कल्याण हो जाए।”

व्यास जी ने मुस्कुराते हुए कहा— “हे कुंतीपुत्र! ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस एकादशी के दिन स्नान और आचमन (शुद्धि के लिए दो-चार बूंद जल) के अलावा जल ग्रहण करना पूरी तरह वर्जित होता है। आचमन में भी केवल उतना ही जल लेना चाहिए जितना एक माशे (लगभग कुछ बूंदें) के बराबर हो, उससे अधिक जल ग्रहण करना मद्यपान के समान माना जाता है।”

व्यास जी ने व्रत की महिमा समझाते हुए आगे कहा— “इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन (द्वादशी) के सूर्योदय तक जो मनुष्य अन्न और जल का पूर्ण त्याग करता है, उसे वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यमराज के दूत ऐसे व्रती को स्पर्श भी नहीं कर पाते, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद उसे दिव्य विमान में बिठाकर परमधाम ले जाते हैं।”

भीमसेन का कठिन व्रत

महर्षि व्यास जी के वचनों को सुनकर भीमसेन ने इस व्रत को करने का संकल्प लिया। ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में बिना जल और अन्न के रहना भीमसेन के लिए अत्यंत कठिन था। व्रत के दिन दोपहर होते-होते प्यास और भूख के कारण भीमसेन की स्थिति बिगड़ने लगी और वे अचेत (बेहोश) होकर गिर पड़े।

तब उनके भाइयों (युधिष्ठिर, अर्जुन आदि) ने उन्हें गंगाजल छिड़ककर होश में लाया। भीमसेन ने अपनी अटूट श्रद्धा और भाइयों के सहयोग से इस अत्यंत कठिन व्रत को पूरा किया।

द्वादशी के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद भीमसेन ने भगवान विष्णु की पूजा की, ब्राह्मणों को भोजन कराया, दान-पुण्य किया और फिर स्वयं भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण किया।

चूंकि इस कठिन व्रत को सबसे पहले भीमसेन ने किया था, इसलिए इस एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ भी कहा जाने लगा।

कथा का महात्म्य और फल

पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे महान पुण्यों की प्राप्ति होती है। निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन के अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन मीठे जल का प्याऊ लगवाना, जल से भरे घड़े का दान करना और जरूरतमंदों की सेवा करना सबसे उत्तम कर्म माना गया है।

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