हरिद्वार में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ पर महामंथन
हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) को लेकर एक बड़े संत समागम का आयोजन किया गया। इस समागम में देश के प्रमुख साधु-संतों ने केंद्र सरकार की इस पहल का खुलकर समर्थन किया। कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मुख्य रूप से शामिल हुए। दोनों नेताओं ने संतों के साथ ‘एक देश, एक चुनाव’ के प्रारूप पर चर्चा की और उनसे सुझाव मांगे।
समागम को संबोधित करते हुए योग गुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से देश के शिक्षा तंत्र में बड़ा सुधार होगा। उन्होंने कहा,
“देश में साल भर कहीं न कहीं चुनाव चलते रहते हैं, जिससे विकास योजनाएं रुकती हैं। हमारे शिक्षकों का 30 फीसदी समय चुनावी ड्यूटी में ही खर्च हो जाता है। यदि देश में एक साथ चुनाव होंगे तो शिक्षकों का समय बचेगा और वे बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सकेंगे।”
विपक्ष पर तंज कसते हुए स्वामी रामदेव ने कहा कि कुछ राजनेताओं को डर है कि कहीं अलग-अलग राज्यों में उनका ‘राजनीतिक मोक्ष’ न हो जाए। देश का वोटर समझदार है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए देशहित से समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि संन्यासियों, दलितों या ब्राह्मणों—किसी को भी जाति या वर्ग के आधार पर निशाना बनाना संविधान व लोकतंत्र के खिलाफ है। जो देश से प्रेम करता है, वह इस व्यवस्था का विरोध नहीं कर सकता।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संतों के समर्थन पर आभार जताते हुए कहा,
“बार-बार चुनाव होना राष्ट्र की उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है। इससे धन का भारी अपव्यय होता है, जातिवाद और भाषावाद को बढ़ावा मिलता है और प्रशासनिक मशीनरी सिर्फ चुनाव की तैयारी में उलझी रहती है। इन सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ है। जल्द ही वह दिन आएगा जब संसद इस पर कानून बनाएगी।”
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि संतों ने इस संकल्प को अपना आशीर्वाद दे दिया है। जब देश में एक साथ चुनाव होंगे तो आर्थिक रूप से देश और मजबूत होगा तथा समय व ऊर्जा की बचत होगी। भाजपा सरकार के कार्यकाल में यह ऐतिहासिक संकल्प जरूर पूरा होगा।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्रपुरी महाराज ने कहा कि आजादी के बाद 1970 तक देश के सभी राज्यों में एक साथ ही चुनाव होते थे। बाद में राजनीतिक कारणों से विधानसभाएं भंग की जाने लगीं और यह परंपरा टूट गई। देश की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए दोबारा ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ लागू करना बेहद जरूरी है।
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