हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय माना जाता है, लेकिन साल की सभी 24 एकादशियों में ‘मोक्षदा एकादशी’ का स्थान सबसे विशिष्ट है। मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली यह तिथि केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मानवता को कर्म का पाठ पढ़ाने वाले महान ग्रंथ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के प्राकट्य का दिन भी है।इस वर्ष 1 दिसंबर 2025 को मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती का पवित्र संयोग बन रहा है।आइए जानते हैं कि आखिर क्यों इसी दिन मनाई जाती है गीता जयंती और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है।
नई दिल्ली:सनातन धर्म में मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है। इसे ‘मोक्षदा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। साल 2025 में यह पावन तिथि कल, यानी 1 दिसंबर (सोमवार) को मनाई जाएगी। यह दिन केवल एकादशी व्रत का नहीं, बल्कि मानवता को कर्म का मार्ग दिखाने वाले महान ग्रंथ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के प्राकट्य दिवस यानी ‘गीता जयंती’ का भी है।
मान्यता है कि द्वापर युग में इसी तिथि पर कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का दिव्य उपदेश देकर उनके मोह का नाश किया था।
पूजा का सबसे उत्तम समय
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, गीता जयंती पर पूजा और गीता पाठ के लिए सबसे शुभ समय 1 दिसंबर को सुबह 06:00 बजे से सुबह 10:00 बजे तक रहेगा। इस दौरान की गई पूजा अत्यंत फलदायी मानी गई है।
कैसे मनाएं गीता जयंती? (पूजन विधि)
यदि आप घर पर गीता जयंती मना रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:
मोक्षदा एकादशी पर ही क्यों मनाई जाती है गीता जयंती?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के आरंभ से ठीक पहले अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखकर विषाद (दुःख) से घिर गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने समय को रोककर अर्जुन को जीवन, मृत्यु, आत्मा और परमात्मा का ज्ञान दिया था। यह संवाद जिस दिन हुआ, वह मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी थी।
चूंकि इस ज्ञान (गीता) से अर्जुन का मोह भंग हुआ और उन्हें मोक्ष के मार्ग का बोध हुआ, इसलिए इस एकादशी को ‘मोक्षदा’ (मोक्ष देने वाली) कहा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता दुनिया का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाई जाती है। इसमें कुल 700 श्लोक हैं, जो कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का अद्भुत संगम हैं।
क्या है इसके पीछे की कहानी?
महाभारत का युद्ध आरंभ होने ही वाला था। दोनों ओर सेनाएं खड़ी थीं। अर्जुन ने जब अपने रथ से शत्रु पक्ष को देखा, तो वहां उन्हें अपने ही गुरु, पितामह भीष्म और सगे-संबंधी नजर आए। मोह और शोक ने अर्जुन को घेर लिया। उन्होंने अपने गांडीव (धनुष) को रख दिया और युद्ध करने से मना कर दिया।
तब भगवान श्री कृष्ण ने समय को रोककर अर्जुन को जीवन, मृत्यु, कर्म, धर्म और मोक्ष का ज्ञान दिया। लगभग 45 मिनट तक चले इस उपदेश में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि “आत्मा न कभी मरती है, न जन्म लेती है, केवल शरीर बदलता है।” इसी दिन भगवान ने अपने ‘विराट रूप’ के दर्शन भी अर्जुन को कराए थे।
इस ज्ञान को प्राप्त कर अर्जुन का मोह नष्ट हुआ और वे युद्ध के लिए तैयार हुए। जिस तिथि को यह संवाद हुआ, वह मोक्षदा एकादशी थी, जिसका अर्थ है ‘मोक्ष प्रदान करने वाली’। इसलिए माना जाता है कि इस दिन गीता पढ़ने या सुनने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मोक्षदा एकादशी का महत्व और राजा वैखानस की कथा
इस दिन का महत्व केवल गीता ज्ञान तक सीमित नहीं है। पद्म पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चम्पक नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करते थे। एक बार उन्होंने स्वप्न में अपने पिता को नर्क में कष्ट भोगते देखा। राजा ने जब इसका उपाय ऋषियों से पूछा, तो पर्वत मुनि ने उन्हें ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत करने और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित करने की सलाह दी।
राजा ने विधि-विधान से यह व्रत किया और पुण्य फल अपने पिता को दान कर दिया। इसके प्रभाव से उनके पिता को नर्क से मुक्ति मिली और वे स्वर्ग पधारे। तभी से यह मान्यता है कि यह एकादशी पितरों को मुक्ति दिलाने और स्वयं के पापों के नाश के लिए सर्वोत्तम है।
कैसे मनाएं यह पर्व?
ज्योतिषविदों के अनुसार, इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। गीता जयंती के अवसर पर घर में ‘भगवद्गीता’ का पाठ अवश्य करें। यदि पूरी गीता पढ़ना संभव न हो, तो कम से कम 11वें अध्याय का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। देश भर के इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों और कुरुक्षेत्र में इस दिन भव्य आयोजन और ‘अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है।
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