
टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड):
हिंदू धर्म में आस्था और विश्वास के कई ऐसे पौराणिक केंद्र हैं, जहां जाने मात्र से मन को असीम शांति मिलती है। इन्हीं में से एक अत्यंत विशेष और चमत्कारी सिद्धपीठ है उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित ‘मां सुरकंडा देवी मंदिर’। मान्यता है कि सुरकुट पर्वत श्रृंखला पर स्थित इस पावन धाम के श्रद्धापूर्वक दर्शन करने से श्रद्धालुओं के सात जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। समुद्र तल से लगभग 2,756 मीटर (करीब 9,042 फुट) की ऊंचाई पर स्थित यह पावन मंदिर देश के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
आइए जानते हैं इस पावन धाम का इतिहास, इसके पौराणिक रहस्य और यहां मिलने वाले उस अनोखे प्रसाद के बारे में, जिसके बिना यह यात्रा अधूरी मानी जाती है।
क्यों पड़ा इस पावन स्थल का नाम ‘सुरकंडा’? (पौराणिक कथा)
इस सिद्धपीठ की स्थापना और महत्व को लेकर केदारखंड व स्कंद पुराण में विस्तृत पौराणिक कथा मिलती है। इसके अनुसार:
- सती का आत्मदाह: पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा दक्ष की पुत्री माता सती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में चुना था, लेकिन दक्ष को यह विवाह स्वीकार नहीं था। एक बार राजा दक्ष ने भव्य यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को तो आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। पति के लाख समझाने के बावजूद माता सती इस यज्ञ में शामिल होने गईं। वहां अपने पति महादेव के लिए की गई अपमानजनक टिप्पणियों को सहन न कर पाने के कारण, उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
- शिव का तांडव और सुदर्शन चक्र: जब भगवान शिव को सती की मृत्यु का समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गए। वे सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर रखकर व्याकुलता में संपूर्ण ब्रह्मांड में घूमने लगे। सृष्टि को शिव के इस रौद्र रूप और विनाशकारी तांडव से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर को धीरे-धीरे काटना शुरू कर दिया।
- ‘सिर’ गिरने से बना ‘सिरकंडा’: इस प्रक्रिया में माता सती के अंग 51 अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जो आगे चलकर पवित्र शक्तिपीठ कहलाए। माना जाता है कि वर्तमान सुरकुट पर्वत पर माता सती का ‘सिर’ गिरा था। सिर गिरने के कारण इस स्थान का नाम पहले ‘सिरकंडा’ पड़ा, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर ‘सुरकंडा’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
इंद्र देव को यहीं मिला था खोया हुआ राज्य
धार्मिक मान्यताओं और पुराणों के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहां देवराज इंद्र ने तपस्या और विशेष प्रार्थना की थी। राक्षसों से पराजित होने के बाद जब इंद्र ने अपना स्वर्ग का साम्राज्य खो दिया था, तब इसी स्थान पर माता की आराधना कर उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त किया था। इसी वजह से भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि मां के इस दरबार में सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर मुराद जरूर पूरी होती है।
अनोखा प्रसाद: रौंसली की पत्तियां (दुआ और दवा का संगम)
आमतौर पर मंदिरों में प्रसाद के रूप में मिठाई, फल या पंचामृत दिया जाता है, लेकिन सुरकंडा देवी मंदिर की परंपरा सबसे अलग है। यहां भक्तों को प्रसाद के रूप में ‘रौंसली’ (वानस्पतिक नाम: टेक्सस बकाटा) के वृक्ष की हरी पत्तियां दी जाती हैं।
- सुख-समृद्धि का प्रतीक: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इन पत्तियों को घर में जिस भी स्थान पर (जैसे तिजोरी या पूजा स्थल) रखा जाता है, वहां सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
- देववृक्ष का दर्जा: स्थानीय निवासी रौंसली को देववृक्ष मानते हैं। इसी कारण इस पेड़ की लकड़ियों का उपयोग केवल धार्मिक अनुष्ठानों में ही किया जाता है; इमारती लकड़ी या किसी अन्य व्यावसायिक उपयोग में इसका प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।
- औषधीय एवं वैज्ञानिक महत्व: वनस्पति विज्ञानियों के अनुसार, रौंसली की इन पत्तियों में अद्भुत औषधीय गुण होते हैं। इनमें कैंसर रोधी (Anti-cancer) तत्व पाए जाते हैं, जिनका उपयोग गंभीर बीमारियों की दवाएं बनाने में किया जाता है।
हिमालय की विहंगम चोटियों के होते हैं दर्शन
सिद्धपीठ मां सुरकंडा देवी मंदिर के कपाट साल भर खुले रहते हैं। मंदिर परिसर से बद्रीनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ, चौखंबा, गौरीशंकर और नीलकंठ जैसी बर्फ से ढकी हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं के विहंगम दर्शन होते हैं।
यूं तो भक्त पूरे वर्ष यहाँ दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन गंगा दशहरा और नवरात्रि के त्योहारों के दौरान यहां आना बेहद विशेष माना जाता है। इस दौरान होने वाले उत्सवों में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
