गुरु गोरखनाथ एक महान योगी थे। लोग उन्हें भगवान शिव का रूप मानते हैं। उन्होंने ही हठयोग की परंपरा शुरू की थी। कहा जाता है कि वे गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के मन से पैदा हुए पुत्र थे।
एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ गांव-गांव जाकर भिक्षा मांग रहे थे। जब वे एक घर पहुंचे, तो वहां की महिला बहुत उदास लग रही थी।
गुरु ने पूछा, “तुम इतनी दुखी क्यों हो?”
महिला ने दुख भरे स्वर में कहा, “मेरे कोई संतान नहीं है, इसीलिए बहुत परेशान हूं।”
गुरु ने उसेमंत्र पढ़कर एक चुटकी भभूत दी। साथ ही आशीर्वाद दिया —
“इसे खा लेना, तुम्हें एक सुंदर बेटा होगा।”
पर उस महिला को गुरु की शक्ति पर भरोसा नहीं था। उसने भभूत को बेकार समझकर गोबर के ढेर में फेंक दिया।
कई साल बीत गए। लगभग 12 साल बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ फिर उसी गांव में आए और सीधे उस महिला के घर पहुंचे।
उन्होंने बाहर से आवाज लगाई —
“अब तो तुम्हारा बेटा 12 साल का हो गया होगा, मुझे दिखाओ!”
महिला डर गई और सारी सच्चाई बता दी। बोली —
“गुरुजी, मैंने आपकी दी हुई भभूत को नहीं खाया। मैं आपकी शक्ति को नहीं समझ सकी और उसे गोबर में फेंक दिया था।”
गुरु ने शांत भाव से कहा —
“मुझे वो जगह दिखाओ, जहां तुमने भभूत फेंकी थी।”
वो उन्हें एक जगह ले गई जहां गोबर का ढेर था। वहां एक गाय खड़ी थी, जो अपने दूध की धार वहीं गिरा रही थी। गुरु मुस्कुराए और उस जगह की ओर देखकर जोर से बोले —
“बेटा, बाहर आओ!”
अचानक गोबर के उस ढेर से एक सुंदर और तेज वाला 12 साल का बालक बाहर निकला। वह हाथ जोड़कर गुरु के सामने खड़ा हो गया।
गुरु ने कहा —
“यह बालक किसी मां के पेट से नहीं, बल्कि मेरी भभूत, गाय के दूध और उस पवित्र जगह से पैदा हुआ है।”
इसलिए उसका नाम रखा गया गोरक्ष — मतलब गाय और रक्षा से जन्मा।
यही बालक आगे चलकर बना गुरु गोरखनाथ, एक महान संत और योगी, जिनका नाम आज भी पूरे भारत में श्रद्धा से लिया जाता है।
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