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भक्त की पीड़ा में जब प्रभु बने सेवक: माधव दास और भगवान जगन्नाथ की दिव्य कथा     

 एक बार संत माधव दास जी गंभीर बीमारी अतिसार (उलटी-दस्त) से पीड़ित हो गए। शरीर इतना दुर्बल हो गया था कि उठने-बैठने की भी शक्ति नहीं बची थी। परंतु वे किसी की सहायता लेना पसंद नहीं करते थे। जब कोई सेवा की बात करता, तो वे कहते —
“मेरे तो केवल एक ही हैं — जगन्नाथ, वही मेरी रक्षा करेंगे।”

संत माधव दास की स्थिति बिगड़ती गई।  शरीर इतना दुर्बल हो गया कि संत को यह भी ज्ञात नहीं होता था कि वे कब मल-मूत्र त्याग करते हैं। उनके वस्त्र गंदे हो जाते, शरीर अस्वच्छ हो जाता — और तब स्वयं भगवान जगन्नाथ एक सेवक के वेश में उनके पास पहुंचे।

उन्होंने भक्त के वस्त्र धोए, उनका शरीर स्वच्छ किया और उनकी सेवा में तन-मन से लगे रहे।

कुछ दिनों बाद जब संत को होश आया, उन्होंने सेवक को निहारते ही पहचान लिया —
“यह कोई साधारण सेवक नहीं, स्वयं त्रिभुवन के स्वामी — मेरे प्रभु जगन्नाथ हैं!”

आश्चर्य और भाव-विभोर होकर माधव दास जी बोले —
“प्रभु! आप मेरी सेवा क्यों कर रहे हैं? आप तो मेरे रोग को पल भर में दूर कर सकते थे। फिर यह सब क्यों?”

भगवान मुस्कराए और बोले —
“देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं देखा जाता। प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है। यदि इस जन्म में इसे न भोगा, तो अगला जन्म लेना पड़ेगा। और मैं नहीं चाहता कि मेरा कोई भक्त केवल थोड़े से प्रारब्ध के कारण पुनः जन्म ले। इसलिए मैंने तुम्हारी सेवा की। लेकिन अब तुम्हारे प्रारब्ध में 15 दिन का रोग शेष है — वो भी मुझे दे दो।”

माधवदास जी ने भावुक होकर 15 दिन का वह कष्ट प्रभु को अर्पित कर दिया।
तभी से भगवान जगन्नाथ हर वर्ष 15 दिन के लिए बीमार पड़ते हैं।

भक्त के लिए यह सेवा केवल उस समय तक सीमित नहीं रही। आज भी हर वर्ष भगवान जगन्नाथ स्नान यात्रा के बाद 15 दिनों के लिए बीमार हो जाते हैं। 

यह कथा  उस असीम प्रेम और समर्पण की गवाही है, जो भगवान और उनके भक्त के बीच होता है।
जहाँ भक्ति सच्ची हो, वहाँ भगवान भी सेवक बन जाते हैं।

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