देहरादून: उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा शुरू होने से पहले ही ‘प्रवेश नियमों’ को लेकर प्रदेश का सियासी पारा चढ़ गया है। गंगोत्री और बदरी-केदार मंदिर समितियों द्वारा गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लिए गए कड़े फैसलों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सत्ता पक्ष जहां इसे आस्था और मर्यादा की रक्षा बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति करार दे रहा है।
विवाद तब शुरू हुआ जब गंगोत्री मंदिर समिति ने प्रस्ताव रखा कि यदि कोई गैर-सनातनी धाम में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे ‘पंचगव्य’ (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) का पान करना होगा। समिति का तर्क है कि इससे व्यक्ति की सनातन धर्म में शुद्धि और आस्था प्रमाणित होगी।
वहीं, बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) ने पहले ही यह साफ कर दिया है कि गैर-सनातनियों को धाम में प्रवेश के लिए एक शपथ पत्र (Affidavit) देना होगा, जिसमें उन्हें मंदिर की परंपराओं के प्रति सम्मान और नियमों के पालन का वादा करना होगा।
विपक्षी दल कांग्रेस ने इन फैसलों को लेकर सरकार और मंदिर समितियों को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि:
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने मंदिर समितियों के स्टैंड का समर्थन किया है। भाजपा विधायक विनोद चमोली और अन्य नेताओं का तर्क है कि:
यह विवाद केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी ‘सनातन बनाम सेक्युलरिज्म’ की बहस तेज हो गई है। दक्षिणपंथी संगठनों ने मंदिर समितियों के फैसले का स्वागत करते हुए इसे ‘देवभूमि की शुद्धता’ के लिए जरूरी बताया है, जबकि नागरिक समाज के कुछ हिस्सों ने इसे पर्यटन और उत्तराखंड की ‘अतिथि देवो भव:’ की छवि के लिए नुकसानदेह बताया है।
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ऐसे में इन विवादों का यात्रा पर क्या असर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी। जानकारों का मानना है कि यदि यह विवाद और बढ़ा, तो सुरक्षा व्यवस्था और तीर्थयात्रियों के वेरिफिकेशन को लेकर प्रशासन पर दबाव और बढ़ सकता है।
फिलहाल, आस्था और राजनीति के इस संगम ने देवभूमि के शांत वातावरण में हलचल पैदा कर दी है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या बीच का रास्ता निकालती है या फिर यह आगामी चुनावों का मुख्य मुद्दा बनेगा।
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