देहरादून: उत्तराखंड में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सुगम और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह ने ‘देवभूमि परिवार अधिनियम 2026’ को अपनी मंजूरी दे दी है। इस स्वीकृति के साथ ही अब राज्य में रहने वाले परिवारों को एक अनूठी ‘देवभूमि परिवार आईडी’ (यूनिक फैमिली आईडी) जारी करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य राज्य के नागरिकों को सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी प्रशासनिक जटिलता के सीधे और सुचारू रूप से पहुंचाना है।
वर्तमान में नागरिकों को अलग-अलग सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने और दस्तावेज सत्यापित कराने पड़ते हैं। इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद, यह आईडी एक डिजिटल पासबुक के रूप में कार्य करेगी। इसमें परिवार को मिलने वाले लाभों और उनकी पात्रता का पूरा विवरण दर्ज होगा, जिससे दस्तावेजों के बार-बार सत्यापन की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी।
इस अधिनियम के तहत महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक विशेष प्रावधान किया गया है। परिवार आईडी में घर की सबसे बुजुर्ग वयस्क महिला (जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो) को ही परिवार का मुखिया माना जाएगा। यदि परिवार में कोई वयस्क महिला सदस्य नहीं है, तभी सबसे उम्रदराज पुरुष को अस्थायी रूप से मुखिया मनोनीत किया जाएगा।
इस कल्याणकारी योजना का लाभ केवल उन्हीं परिवारों को मिल सकेगा, जो पिछले 15 वर्षों या उससे अधिक समय से निरंतर उत्तराखंड की भौगोलिक सीमा के भीतर रह रहे हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि राज्य के संसाधनों का लाभ वास्तविक और स्थायी निवासियों तक पहुंचे।
पारिवारिक सूचनाओं की सुरक्षा के लिए इस कानून में बेहद सख्त सुरक्षात्मक कदम उठाए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति डेटाबेस के साथ अनधिकृत छेड़छाड़ या डेटा चोरी का प्रयास करता है, तो उसके खिलाफ न्यूनतम 50 लाख रुपये का जुर्माना और 10 साल तक की कैद का कानूनी प्रावधान किया गया है।
योजना के सुचारू और निष्पक्ष संचालन के लिए एक विशेष ‘देवभूमि परिवार प्राधिकरण’ का गठन किया जाएगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लाए गए इस अधिनियम का लक्ष्य विभिन्न विभागों के बीच लाभार्थी डेटा के दोहराव को रोकना और सरकारी बजट का सही सदुपयोग सुनिश्चित करना है। राज्य सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था के लागू होने से अपात्र लोगों को लाभ मिलने की गुंजाइश खत्म होगी और सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले अंतिम पात्र व्यक्ति तक भी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पूरी पारदर्शिता के साथ पहुंचेगा।
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