UTTARAKHAND

पहाड़ पर बेहाल किसान: ओलावृष्टि और बारिश ने छीना निवाला, 179 हेक्टेयर में गेहूं-मटर की फसलें नष्ट

देहरादून | उत्तराखंड में इस बार गर्मी आने से पहले ही ‘रफूचक्कर’ हो गई है। अप्रैल से मई के शुरुआती हफ्ते तक हुई बेमौसम भारी बारिश और ओलावृष्टि ने प्रदेश के किसानों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों तक खेतों में खड़ी फसलें बिछ गई हैं। कृषि निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 35 दिनों में प्रदेश की 179.47 हेक्टेयर कृषि भूमि पर मौसम की मार पड़ी है।

खबर की बड़ी बातें:

  • नुकसान का दायरा: 1 अप्रैल से 5 मई के बीच 179.47 हेक्टेयर फसल प्रभावित।
  • प्रभावित किसान: प्रदेश के 522 किसानों की मेहनत पर फिरा पानी।
  • सबसे ज्यादा असर: टिहरी, पिथौरागढ़ और देहरादून जिले सबसे अधिक प्रभावित।
  • बर्बाद फसलें: गेहूं, जौ, मटर, टमाटर, मसूर, बीन्स के साथ आम-लीची को भारी क्षति।

टिहरी में सबसे ज्यादा तबाही

कृषि विभाग की रिपोर्ट बताती है कि बेमौसम बारिश का सबसे भीषण रूप टिहरी जिले में देखने को मिला।

  1. टिहरी: 87.40 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित।
  2. पिथौरागढ़: 48.47 हेक्टेयर में फसलों को नुकसान।
  3. देहरादून: 38.50 हेक्टेयर कृषि भूमि पर असर।
  4. अल्मोड़ा: 5 हेक्टेयर में फसल बर्बाद।
    चंपावत में भी सीमित क्षेत्रों में नुकसान दर्ज किया गया है।

पॉली हाउस टूटे, बागवानी भी चौपट

देहरादून किसान संगठन के पदाधिकारी आशीष राजवंशी ने बताया कि ओलावृष्टि इतनी खतरनाक थी कि किसानों के पॉली हाउस तक क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

  • पहाड़ों पर: नई पौध (सीडलिंग) और मटर-जौ की फसल खराब हुई।
  • मैदानों में: लीची और आम के बौर ओलों की वजह से गिर गए हैं, जिससे बागवानों को इस साल भारी घाटे की आशंका है।
  • मांग: राजवंशी का कहना है कि सरकार पॉली हाउस के मेंटेनेंस में तो मदद करती है, लेकिन पारंपरिक खेती करने वाले किसानों को मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

मुआवजे पर क्या बोली सरकार?

नुकसान को लेकर सरकार अब हरकत में आई है। आपदा प्रबंधन सचिव विनोद सुमन ने कहा, “बारिश और ओलावृष्टि से कृषि व बागवानी को हुए नुकसान का लगातार आकलन किया जा रहा है। कृषि और उद्यान विभाग की टीमें फील्ड विजिट कर डेटा जुटा रही हैं। प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की प्रक्रिया गतिमान है।”

क्यों बढ़ी किसानों की चिंता?

मई का महीना कटाई और नई बुवाई का होता है। ऐसे में अतिवृष्टि ने न केवल तैयार फसल को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि मिट्टी में नमी ज्यादा होने से अगली फसल की बुवाई में भी देरी होने की संभावना है। सिंचित क्षेत्रों की तुलना में असिंचित (बारिश पर निर्भर) क्षेत्रों के छोटे किसान इस आपदा से सबसे ज्यादा टूट गए हैं।

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