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उत्तरकाशी: धराली आपदा में मलबे को छेड़ना हो सकता है खतरनाक, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

देहरादून: उत्तरकाशी के धराली में आई विनाशकारी आपदा के बाद अब वैज्ञानिकों ने मलबे को हटाने को लेकर गंभीर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारी मात्रा में जमा इस मलबे के साथ छेड़छाड़ करना एक और बड़े खतरे को न्योता दे सकता है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, यह क्षेत्र भूवैज्ञानिक रूप से बेहद संवेदनशील है और मलबे को हटाने की किसी भी प्रक्रिया से पहले विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इस आपदा के पीछे के कारणों पर प्रकाश डाला है।उनका मानना है कि यह आपदा केवल बादल फटने का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियर झीलों का फटना या भूस्खलन जैसे जटिल कारण हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि खीर गंगा के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में ग्लेशियर तालाबों की एक पूरी श्रृंखला मौजूद है।आशंका है कि भारी बारिश के कारण इनमें से कोई तालाब टूटा होगा, जिसके बाद पानी और मलबा तेज गति से नीचे की ओर आया और तबाही मचा दी।

क्यों खतरनाक है मलबा हटाना?

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, धराली और उसके आसपास का क्षेत्र “मोरaine” यानी हिमनदों द्वारा लाए गए ढीले मलबे पर बसा हुआ है। यह मलबा अभी अस्थिर है। बारिश के कारण यह पहले से ही पानी से भरा हुआ और कमजोर है। ऐसे में भारी मशीनरी का उपयोग कर इसे हटाने की कोशिश करने से:

  • नए भूस्खलन का खतरा: मलबे के ढलान का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे और भूस्खलन हो सकता है।
  • नदी का रास्ता बदलना: मलबा हटाने से भागीरथी नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो सकता है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
  • अचानक बाढ़: मलबे के अंदर फंसी हुई अस्थायी झीलें बन सकती हैं, जिनके अचानक फटने से फिर से बाढ़ आ सकती है।

भू-गर्भशास्त्री पहले भी धराली को “बारूद का ढेर” बताते हुए चेतावनियां देते रहे हैं, लेकिन अक्सर इन पर ध्यान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि नदी के किनारे या फ्लड प्लेन पर निर्माण करना बेहद खतरनाक है, क्योंकि ये क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि हमारे पूर्वजों ने इन जोखिम भरे स्थानों पर कभी बस्तियां नहीं बसाईं, लेकिन आधुनिक समय में बिना भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के निर्माण कार्य किए गए।

सरकार ने आपदा के कारणों के अध्ययन के लिए एक टीम का गठन किया है, जो अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। तब तक, वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि मलबे के साथ कोई बड़ी छेड़छाड़ न की जाए और बचाव कार्यों को भी अत्यंत सावधानी से अंजाम दिया जाए। उनका सुझाव है कि किसी भी दीर्घकालिक समाधान पर पहुंचने से पहले क्षेत्र की स्थिरता का गहन विश्लेषण आवश्यक है।

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