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जब तुलसी की एक पत्ती ने श्रीकृष्ण को तौल दिया!

प्राचीन काल की एक पौराणिक कथा है जो श्रीकृष्ण, सत्यभामा और तुलसी जी की महिमा से जुड़ी है।

सत्यभामा, द्वारका की रानी और श्रीकृष्ण की पत्नी, अत्यंत रूपवती और अभिमानी थीं। उन्हें अपने सौंदर्य और श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रेम पर बहुत गर्व था। उन्हें लगता था कि श्रीकृष्ण उनकी सुंदरता से मोहित हैं और इसीलिए वह अन्य रानियों से अधिक ध्यान उन्हीं पर देते हैं।

एक दिन देवर्षि नारद मुनि द्वारका आए। सत्यभामा ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और प्रसन्न होकर उनसे आशीर्वाद मांगा कि अगले जन्म में भी उन्हें श्रीकृष्ण ही पति रूप में प्राप्त हों।

नारद जी मुस्काए और बोले, “देवी, इस सृष्टि का नियम है कि जो वस्तु इस जन्म में दान की जाती है, वही अगले जन्म में पुनः प्राप्त होती है। यदि आप चाहती हैं कि श्रीकृष्ण फिर से आपके पति बनें, तो आपको उन्हें इस जन्म में दान देना होगा।”

सत्यभामा, अपने अभिमान और विश्वास में, बिना सोचे-समझे श्रीकृष्ण को नारद जी को दान में दे देती हैं। नारद मुनि, श्रीकृष्ण को साथ लेकर चलने लगते हैं। यह देख अन्य रानियां चिंतित हो उठती हैं और नारद मुनि को रोक लेती हैं।

नारद जी कहते हैं, “यदि आप श्रीकृष्ण को वापस चाहती हैं, तो उनके वजन के बराबर सोना, चांदी, रत्न और आभूषण तराजू में रखिए।”

एक विशाल तराजू लाया जाता है। एक ओर श्रीकृष्ण को बैठाया जाता है, और दूसरी ओर रानियां अपने सारे आभूषण रखने लगती हैं। लेकिन आश्चर्य! पलड़ा हिलता भी नहीं। एक के बाद एक, सबकुछ चढ़ाया जाता है – महल की सारी दौलत, आभूषण, रत्न – मगर श्रीकृष्ण का पलड़ा भारी ही बना रहता है।

अब सत्यभामा सामने आती हैं। उन्हें पूरा विश्वास होता है कि उनके पास इतना धन है कि वे श्रीकृष्ण को तौल सकती हैं। लेकिन जब उन्होंने अपने सारे आभूषण उस पलड़े में चढ़ा दिए, तब भी पलड़ा ज़रा भी नहीं हिला।

सत्यभामा हताश हो जाती हैं। तभी रुक्मिणी जी को एक युक्ति सूझती है। वे ध्यानपूर्वक तुलसी पूजन करती हैं और एक तुलसी की पत्ती लेकर आती हैं। फिर वह श्रद्धा और प्रेम से भरी तुलसी पत्ती को तराजू में रखती हैं और चमत्कार होता है — तराजू संतुलित हो जाता है!

सभी स्तब्ध रह जाते हैं। नारद जी मुस्काते हैं और कहते हैं, “श्रद्धा और भक्ति की शक्ति अनंत होती है। यह तुलसी की पत्ती नहीं, रुक्मिणी जी का निःस्वार्थ प्रेम और भक्ति है, जिसने भगवान को संतुलित कर दिया।”

इस घटना के बाद से ही भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी अति प्रिय हो गईं। ऐसा माना जाता है कि तभी से वे तुलसी की पत्ती धारण करने लगे।

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