जब पुरी में भगवान जगन्नाथ जी का भव्य धाम बना, तो केवल मानव ही नहीं, बल्कि देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्व और किन्नर भी उनके दिव्य दर्शन के लिए आने लगे। यह धाम धीरे-धीरे समस्त सृष्टि का आध्यात्मिक केंद्र बन गया। सब कुछ देखकर समुद्र देवता के हृदय में भी प्रभु के दर्शन की तीव्र इच्छा जागृत हुई।
एक दिन, समुद्र की लहरें शांत नहीं रहीं। वह स्वयं जगन्नाथ जी के दर्शन को चल पड़ा। जब समुद्र मंदिर तक पहुंचा, तो उसका जल आसपास फैलने लगा, जिससे भक्तों को कष्ट होने लगा। यह घटना बार-बार घटने लगी। भक्त व्याकुल हो उठे और उन्होंने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की कि वह उन्हें इस संकट से मुक्त करें।
तब प्रभु ने अपने प्रिय भक्त हनुमान जी को आदेश दिया, “हे पवनसुत, तुम समुद्र को नियंत्रित करो।” आज्ञा मिलते ही हनुमान जी ने समुद्र की मर्यादा बांध दी। अब समुद्र मंदिर तक नहीं पहुंच पाता था।
लेकिन लीला यहीं समाप्त नहीं हुई। समुद्र ने एक युक्ति सोची। वह हनुमान जी से कहने लगा, “हे वीर हनुमान! तुम तो परम भक्त हो, क्या तुम्हें प्रभु के दर्शन की लालसा नहीं होती?” बार-बार यही बात दोहराकर उसने हनुमान जी के मन में दर्शन की प्रबल इच्छा जगा दी।
हनुमान जी जब-जब दर्शन को मंदिर जाते, समुद्र भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ता। यह फिर से समस्या बन गई। भक्तों ने दोबारा प्रभु से विनती की। तब भगवान जगन्नाथ जी ने एक अनोखा उपाय किया। उन्होंने समुद्र के समीप हनुमान जी के चरणों में सोने की बेड़ियाँ डाल दीं — ताकि वे मंदिर न जा सकें और समुद्र भी अपने मर्यादा में रहे।
इसी लीला की स्मृति में आज भी पुरी में समुद्र तट के निकट ‘बेड़ी हनुमान मंदिर’ स्थित है, जहाँ हनुमान जी के चरणों में आज भी बेड़ियाँ देखी जा सकती हैं।जब जगन्नाथ प्रभु ने हनुमान जी को बेड़ी लगाई!
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