देहरादून/पिथौरागढ़। उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में स्थित आदि कैलाश और ओम पर्वत यात्रा इस साल एक नई पहचान हासिल कर रही है। यात्रा शुरू होने के महज 33 दिनों के भीतर 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं और पर्यटकों को इनर लाइन परमिट जारी किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि देशभर में इस दिव्य धाम के प्रति लोगों की आस्था और आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2 जून 2026 तक कुल 30,016 इनर लाइन परमिट जारी किए जा चुके हैं। केवल एक दिन में ही 1,178 परमिट जारी होना यात्रा के प्रति लोगों के भारी उत्साह को प्रमाणित करता है।
अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो साल 2024 में पूरे यात्रा सीजन के दौरान कुल 29,352 परमिट जारी हुए थे, जबकि साल 2025 में यह संख्या 36,526 थी। इस साल महज 33 दिनों में ही यात्रा ने साल 2024 के पूरे आंकड़े को पीछे छोड़ दिया है। जिस रफ्तार से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, उससे इस साल पुराना हर रिकॉर्ड ध्वस्त होना तय माना जा रहा है।
पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाईं का मानना है कि इस बार यात्रा सीजन की समाप्ति तक श्रद्धालुओं की संख्या पिछले सभी वर्षों से अधिक रहने वाली है। जिलाधिकारी के अनुसार, 1 से 31 मई 2026 के बीच लगभग 28 हजार श्रद्धालु और पर्यटक आदि कैलाश व ओम पर्वत पहुंच चुके हैं। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।
“उत्तराखंड के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर आदि कैलाश अब तेजी से एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है। चारधाम यात्रा के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अब सीमांत क्षेत्र के इस दिव्य धाम को भी अपनी यात्रा सूची में शामिल कर रहे हैं। इससे क्षेत्र की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई है।”— आशीष कुमार भटगाईं, जिलाधिकारी, पिथौरागढ़
आदि कैलाश-ओम पर्वत यात्रा का विधिवत शुभारंभ 1 मई 2026 को जोलिंगकोंग स्थित पवित्र पार्वती कुंड के समीप भगवान शिव के मंदिर के कपाट खुलने के साथ हुआ था। कपाट खुलने के बाद से ही देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं, पर्यटकों, पर्वत प्रेमियों और प्रकृति के बीच आध्यात्मिक शांति तलाशने वाले लोगों का लगातार आगमन बना हुआ है।
आदि कैलाश और ओम पर्वत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दौरे मील का पत्थर साबित हुए हैं।
इन दौरों ने न केवल इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व बढ़ाया, बल्कि देशभर के लोगों में यहां आने की उत्सुकता भी पैदा की, जिसका असर अब आंकड़ों में साफ दिख रहा है।
यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीमांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए भी नई उम्मीद बनकर उभरी है। भारत-चीन और भारत-नेपाल सीमा से लगे गांवों में होमस्टे, होटल, टैक्सी सेवाएं, स्थानीय उत्पादों की बिक्री, घोड़ा-खच्चर संचालन और पर्यटन से जुड़े अन्य व्यवसायों को इसका सीधा लाभ मिल रहा है। आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने से स्थानीय युवाओं को अपने गांवों में ही रोजगार मिलने लगा है, जिससे पलायन की समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है।
जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं से सुरक्षित, व्यवस्थित और सुगम यात्रा के लिए अपील की है कि:
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