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TV10 INDIA खास: भागीरथी इको सेंसिटिव जोन में पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की तैयारी, अब होगा व्यापक अध्ययन

देहरादून/उत्तरकाशी: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में विकास की रफ्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच मचे द्वंद्व को सुलझाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने एक बड़ी पहल की है। उत्तरकाशी जिले के भागीरथी इको सेंसिटिव जोन (BESZ) का अब नए सिरे से विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। इसमें न केवल आपदाओं के वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल होगी, बल्कि पहली बार उन स्थानीय लोगों के दर्द को भी सुना जाएगा, जो सख्त नियमों के कारण अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस अध्ययन का खाका तैयार किया गया।

4 बिंदुओं पर केंद्रित होगा अध्ययन:

  1. आपदाओं का विश्लेषण: हाल के वर्षों में धराली और आसपास के क्षेत्रों में आए भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं के प्राकृतिक और मानवजनित कारणों की जांच।
  2. स्थानीय लोगों की समस्याएं: नियमों की वजह से सड़क, बिजली और छोटे निर्माण कार्यों में आ रही बाधाओं का ब्यौरा तैयार करना।
  3. पर्यटन का दबाव: गंगोत्री धाम और ग्लेशियर क्षेत्र में बढ़ती पर्यटकों की संख्या का पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव।
  4. जैव विविधता: क्षेत्र में मौजूद दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों की वर्तमान स्थिति का आकलन।

क्यों जरूरी है यह अध्ययन? (ग्राफिक्स बॉक्स)

  • क्षेत्रफल: लगभग 4000 वर्ग किलोमीटर।
  • आबादी: करीब 60 से 62 हजार लोग इस जोन में रहते हैं।
  • संरक्षित क्षेत्र: इस इलाके का 98% हिस्सा रिजर्व फॉरेस्ट या गंगोत्री बायोस्फियर रिजर्व में आता है।
  • महत्व: यह भागीरथी (गंगा) का उद्गम स्थल है, इसलिए यहाँ की पारिस्थितिकी का सीधा असर देश की जल सुरक्षा पर पड़ता है।

मास्टर प्लान के लिए अलग प्रशासनिक ढांचे का सुझाव

उत्तरकाशी के जिलाधिकारी और भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के सदस्य सचिव प्रशांत आर्य के अनुसार, वर्ष 2020 में तैयार जोनल मास्टर प्लान को प्रभावी ढंग से लागू करने में कई चुनौतियां आ रही हैं। इसके समाधान के लिए एक अलग समर्पित प्रशासनिक ढांचा बनाने का सुझाव दिया गया है। इससे फाइलों के निपटारे और विकास कार्यों की अनुमति की प्रक्रिया तेज हो सकेगी।

स्थानीय बनाम पर्यावरण: एनजीटी और कोर्ट तक पहुंचे मामले

इस अध्ययन में उन मामलों का भी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे हैं। अक्सर स्थानीय ग्रामीणों को अपने मकान की मरम्मत या गांव की छोटी सड़क के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता है, जिससे क्षेत्र में असंतोष रहता है। भूगर्भशास्त्री एस.पी. सती का कहना है कि हिमालय में संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। नियम ऐसे होने चाहिए जो पर्यावरण भी बचाएं और स्थानीय लोगों को पलायन के लिए मजबूर न करें।

अगली बैठक जून में

सरकार ने इस अध्ययन के लिए समय सीमा तय कर दी है। जून महीने में एक और उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक होगी, जिसमें अध्ययन की प्रगति और जुटाए गए डेटा पर चर्चा की जाएगी।

निष्कर्ष: यह अध्ययन न केवल भागीरथी घाटी बल्कि पूरे उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के लिए भविष्य की विकास नीतियों का आधार बन सकता है।

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