सदना नाम का एक ईमानदार कसाई था जो हमेशा भगवान का नाम जपता रहता था, यहाँ तक कि मांस काटते और बेचते समय भी। एक दिन उसे एक चमत्कारी पत्थर मिला जो तराजू में रखने पर अपने आप उतना ही वज़नी हो जाता था जितना वज़न तोलना होता था। इस चमत्कार से उसकी दुकान पर भीड़ बढ़ने लगी।
एक ब्राह्मण ने इस पत्थर के बारे में सुना और उत्सुकतावश सदना की दुकान पर आया। उसने सदना को बताया कि वह पत्थर वास्तव में शालिग्राम भगवान हैं और उनका मांस तोलने में उपयोग करना महापाप है। सरल हृदय सदना ने अपनी गलती महसूस की और शालिग्राम को ब्राह्मण को सौंप दिया ताकि वे उनकी विधिवत पूजा कर सकें।
ब्राह्मण शालिग्राम को घर ले जाकर पूजा-अर्चना करने लगा। कुछ दिनों बाद शालिग्राम भगवान ने ब्राह्मण के स्वप्न में आकर कहा कि वे सदना के पास लौटना चाहते हैं क्योंकि सदना का निरंतर नाम-कीर्तन उन्हें ब्राह्मण की औपचारिक पूजा से अधिक प्रिय है।
अगले दिन ब्राह्मण ने शालिग्राम को सदना को लौटा दिया और पूरी बात बताई। सदना की आँखों में आँसू आ गए और उसने मांस बेचने का काम छोड़ने तथा अपना जीवन भगवान के नाम-कीर्तन में समर्पित करने का निश्चय किया।
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