देहरादून।उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस वर्ष आस्था के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। 19 अप्रैल से शुरू हुई इस यात्रा में अब तक 28 लाख से अधिक श्रद्धालु बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के दर्शन कर चुके हैं। श्रद्धालुओं की इस रिकॉर्ड संख्या के साथ ही हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण को सुरक्षित रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी बन गया है। यात्रा के शुरुआती 51 दिनों (31 मई तक) में चारों धामों से लगभग 288 टन से अधिक कूड़ा-कचरा एकत्र कर उसे सुरक्षित रीसायकलिंग के लिए भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
एकत्रित किए गए कुल 288 टन कचरे में से सबसे अधिक हिस्सा केदारनाथ धाम और उसके यात्रा मार्ग से आया है, जहां से लगभग 122 टन कचरा एकत्र किया गया है। इसके अलावा यमुनोत्री से 80 टन, गंगोत्री से 70 टन और बदरीनाथ क्षेत्र से लगभग 10 टन कचरा इकट्ठा किया गया है। स्थानीय प्रशासन और नगर निकायों द्वारा इस कचरे को ऊंचाई वाले क्षेत्रों से लगातार नीचे लाया जा रहा है ताकि धाम परिसरों को पूरी तरह स्वच्छ रखा जा सके।
उत्तराखंड के चारों धाम लगभग 3,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं। इनके आसपास चंपासर, गंगोत्री, चोराबारी, कंपेनिंग, सतोपंथ और अलकापुरी जैसे प्रमुख हिमालयी ग्लेशियर मौजूद हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यात्रा मार्गों पर फैलने वाला प्लास्टिक कचरा (जैसे बोतलें, रैपर और पॉलिथीन) सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता। यह कचरा ग्लेशियरों के पास जमा होकर वहां का तापमान बढ़ा सकता है, जिससे हिमनदों के तेजी से पिघलने का खतरा रहता है। इसके साथ ही यह कचरा बुग्यालों (घास के मैदानों) की जड़ी-बूटियों, प्राकृतिक जल स्रोतों और स्नो लेपर्ड, हिमालयी भालू व भरल जैसे दुर्लभ वन्यजीवों को भी नुकसान पहुंचाता है। इसी गंभीर खतरे को देखते हुए प्रशासन ने स्वच्छता अभियान को तेज कर दिया है।
यात्रा मार्गों पर कचरे के वैज्ञानिक और सुरक्षित निस्तारण के लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है:
चारधाम में स्वच्छता बनाए रखने के लिए केवल प्रशासनिक मशीनरी ही काफी नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धालुओं की भागीदारी भी सबसे महत्वपूर्ण है। केदारनाथ और अन्य धामों में ‘कैरी मी बैक’ जैसी पहलों के जरिए श्रद्धालुओं को अपना प्लास्टिक कचरा वापस लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यदि प्रत्येक श्रद्धालु संवेदनशील पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे, तो देवभूमि की इस पवित्र और ऐतिहासिक यात्रा को पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (Eco-Friendly) बनाया जा सकता है।
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