देहरादून। उत्तराखंड के बेशकीमती साल के जंगलों पर एक बार फिर ‘मौत का साया’ मंडरा रहा है। एक खतरनाक कीट की वजह से देहरादून वन प्रभाग के हजारों पेड़ों के अस्तित्व पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि करीब 19,170 पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें काटने तक की नौबत आ गई है। वन विभाग अब विशेषज्ञों की राय लेकर इस ‘अदृश्य दुश्मन’ के खिलाफ बड़े अभियान की तैयारी कर रहा है।
इस कीट का वैज्ञानिक नाम ‘होपलो सिरेंबिक्स स्पाइनिकॉर्निस’ (Hoplo cerambyx spinicornis) है, जिसे आम भाषा में ‘साल बोरर’ कहा जाता है।
इतिहास गवाह है कि 1990 के दशक की शुरुआत में थानो रेंज में इस कीट ने भारी तबाही मचाई थी। अब करीब 36 साल बाद यह दोबारा सक्रिय हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के वैज्ञानिकों के सर्वे के मुताबिक, देहरादून की तीन मुख्य रेंजों में संक्रमण सबसे ज्यादा है:
संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए वन विभाग पारंपरिक लेकिन अचूक ‘ट्री ट्रैप’ तकनीक अपनाएगा।
“जिन पेड़ों की ऊपरी छत्र सूख चुकी है, उन्हें काटना जरूरी है ताकि संक्रमण स्वस्थ पेड़ों तक न फैले। केंद्र से अनुमति मांगी गई है और मानसून के दौरान ‘ट्री ट्रैप’ ऑपरेशन चलाया जाएगा। हम इसके स्थायी समाधान के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करा रहे हैं।”— सुबोध उनियाल, वन मंत्री, उत्तराखंड
“क्षेत्र में कई जगहों पर कीट का प्रकोप देखा जा रहा है। जिन वृक्षों से इन कीटों को नहीं हटाया जा सकता, उन्हें काटना ही एकमात्र उपाय है। विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही अगला कदम उठाया जाएगा।”— नीरज शर्मा, डीएफओ, देहरादून
साल का पेड़ न केवल ऑक्सीजन का भंडार है, बल्कि यह प्रदूषण कम करने में ‘नेचुरल फिल्टर’ का काम करता है। यह मिट्टी के कटाव को रोकता है और जंगली हाथियों व बाघों का प्राकृतिक आवास है। छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष होने के साथ-साथ यह भारतीय वानिकी के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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