UTTARAKHAND

धराली का कल्प केदार मंदिर: जो खुदाई में मिला, फिर मलबे में हो गया विलीन

DEHRADUN: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार, 5 अगस्त, 2025 को बादल फटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। खीर गंगा नदी में अचानक आए उफान और उसके साथ आए भारी मलबे ने पूरे गांव को अपनी चपेट में ले लिया। इस भीषण आपदा में अब तक चार लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 50 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। पूरा गांव और बाजार मलबे में तब्दील हो गया है, और यहाँ स्थित ऐतिहासिक कल्प केदार मंदिर भी बाढ़ की भेंट चढ़ गया है।

तबाही का भयावह मंजर

मंगलवार दोपहर लगभग डेढ़ बजे खीर गंगा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में बादल फटने की घटना हुई, जिसके बाद नदी का जलस्तर विनाशकारी रूप से बढ़ गया। महज़ 30 से 34 सेकंड के भीतर पानी और मलबे का सैलाब पूरे गांव में फैल गया और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर दिया। इस घटना में 25 से अधिक होटल, गेस्ट हाउस और घर पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात कर स्थिति का जायजा लिया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है।सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें बड़े पैमाने पर बचाव और राहत कार्यों में जुटी हुई हैं, हालांकि भूस्खलन के कारण बचाव कार्यों में दिक्कतें आ रही हैं।

मलबे में समाया प्राचीन कल्प केदार मंदिर

इस आपदा ने धराली की सांस्कृतिक विरासत पर भी गहरा आघात किया है। गांव में स्थित प्राचीन कल्प केदार मंदिर पूरी तरह से मलबे में दब गया है। यह मंदिर पुरातात्विक विभाग की सूची में शामिल था और इसके अवशेष 17वीं सदी के माने जाते हैं। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह जमीन की सतह से नीचे बना था और खीर गंगा का पानी एक विशेष मार्ग से होकर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग का निरंतर अभिषेक करता था।यह मंदिर भी कई वर्षों तक जमीन के नीचे दबा रहा था और वर्ष 1945 में खुदाई के बाद इसे पुनः खोजा गया था।

केदारनाथ धाम से था विशेष संबंध

कल्प केदार मंदिर की बनावट और शिल्प केदारनाथ धाम से काफी मिलता-जुलता था, क्योंकि दोनों ही मंदिर प्राचीन कत्यूर शैली में बने हैं। यही नहीं, कल्प केदार के गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग का आकार भी केदारनाथ के शिवलिंग की भांति नंदी की पीठ जैसा था। इन समानताओं के कारण इसे केदारनाथ धाम से खास तौर पर जोड़ा जाता था।

चार धाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव

धराली गांव गंगोत्री धाम के रास्ते में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से लगभग 75 किलोमीटर दूर स्थित है। गंगोत्री जाने वाले श्रद्धालु और पर्यटक अक्सर यहां रुककर कल्प केदार मंदिर के दर्शन करते थे। इस आपदा से न केवल जन-धन की हानि हुई है, बल्कि चार धाम यात्रा के एक महत्वपूर्ण केंद्र को भी भारी क्षति पहुंची है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आपदा जलवायु परिवर्तन और नदी के किनारे अनियोजित निर्माण गतिविधियों का मिला-जुला परिणाम हो सकती है।

महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास

कल्प केदार मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जोड़ा जाता है और इसे पांडवकालीन भी बताया जाता है। कुछ मान्यताएं इसे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित भी मानती हैं। यह मंदिर अपनी विशिष्ट कत्यूरी शिखर शैली की वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे केदारनाथ मंदिर के समान बनाती है। धराली, जहां यह मंदिर स्थित है, गंगोत्री राजमार्ग पर उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर है। प्राचीन काल में यह स्थान श्यामप्रयाग के नाम से जाना जाता था, जो भागीरथी और खीरगंगा का संगम स्थल है।

एक रहस्यमयी खोज

यह मंदिर हमेशा से भक्तों के लिए सहज रूप से सुलभ नहीं था। कहा जाता है कि 19वीं सदी में आई किसी भीषण बाढ़ या प्राकृतिक आपदा के कारण यह मंदिर पूरी तरह से भूमि में समा गया था। दशकों तक गुमनाम रहने के बाद, साल 1945 में जब खीरगंगा का बहाव कुछ कम हुआ, तो स्थानीय लोगों को मंदिर के शिखर जैसी एक संरचना दिखाई दी।

इसके बाद हुई खुदाई में यह भव्य मंदिर प्रकट हुआ। हालांकि, खुदाई के बाद भी मंदिर का एक बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे ही रहा।इसका गर्भगृह प्रवेश द्वार से लगभग सात मीटर नीचे था, और भक्तों को दर्शन-पूजन के लिए कई फीट नीचे उतरकर जाना पड़ता था।मंदिर के गर्भगृह में स्फटिक का एक अद्भुत शिवलिंग स्थापित था।

प्रकृति का प्रहार और भविष्य पर सवाल

यह पहली बार नहीं है जब कल्प केदार मंदिर को प्रकृति का प्रकोप झेलना पड़ा है। पहले भी यह प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो चुका है। लेकिन इस बार की तबाही ने मंदिर के अस्तित्व पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जहां पहले खुदाई ने इस विलुप्त मंदिर को एक नई सुबह दी थी, वहीं आज यह फिर से उसी धरती के गर्भ में विलीन हो गया है, अपने पीछे कई कहानियाँ और एक अनिश्चित भविष्य छोड़कर। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल मौके पर मौजूद हैं, लेकिन मलबे की विशाल मात्रा को देखते हुए मंदिर को फिर से उसके पुराने स्वरूप में लाना एक बड़ी चुनौती होगी।

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