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उत्तराखंड में पानी के स्रोतों का ऐतिहासिक डिजिटल सर्वे: पहली बार हो रही झरनों की गणना; अल्मोड़ा और चमोली में मिले सबसे ज्यादा गाड़-गदेरे

देहरादून, 1 जून।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बहने वाले झरने और गाड़-गदेरे (पहाड़ी जलधाराएं) सदियों से स्थानीय जीवन, पेयजल और खेती का मुख्य आधार रहे हैं। हालांकि, आज तक सरकार के पास इन प्राकृतिक जल स्रोतों का कोई आधिकारिक और व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। अब देश में पहली बार झरनों की व्यवस्थित गणना का काम किया जा रहा है। उत्तराखंड में यह महत्वपूर्ण अभियान लघु सिंचाई विभाग और हिमोत्थान संस्था द्वारा संयुक्त व स्वतंत्र रूप से चलाया जा रहा है। यह सर्वे अब अपने अंतिम चरण में है और अगले एक महीने के भीतर इसके पूरे होने की उम्मीद है।


खबर के मुख्य बिंदु :

  • ऐतिहासिक पहल: देश के इतिहास में पहली बार प्राकृतिक झरनों और गाड़-गदेरों का राष्ट्रीय स्तर पर डेटाबेस तैयार किया जा रहा है।
  • अल्मोड़ा में सबसे अधिक जल स्रोत: अब तक के आंकड़ों के अनुसार, अल्मोड़ा जिले में सबसे अधिक 9,600 से ज्यादा झरने दर्ज किए गए हैं। चमोली 8,077 झरनों के साथ दूसरे स्थान पर है।
  • जियो-टैगिंग से सर्वे: मोबाइल ऐप और जियो-टैगिंग जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से प्रत्येक जल स्रोत की स्थिति और जल प्रवाह को रिकॉर्ड किया जा रहा है।
  • जंगलों के झरने अभी बाहर: यह सर्वेक्षण केवल राजस्व क्षेत्रों (Revenue Areas) में किया जा रहा है। वन भूमि पर मौजूद झरने अभी इस गणना के दायरे से बाहर हैं।

क्या होते हैं ‘गाड़-गदेरे’?

पर्वतीय क्षेत्रों की स्थानीय भाषा में ‘गाड़’ और ‘गदेरे’ का अर्थ प्राकृतिक जल धाराओं से होता है:

  • गाड़: पहाड़ों से बहकर आने वाली उन छोटी बारहमासी नदियों को कहा जाता है, जो लगातार पानी और तलछट लाती हैं।
  • गदेरे: ये अपेक्षाकृत संकरी और मौसमी जल-धाराएं होती हैं, जिनमें बारिश के समय पानी बढ़ जाता है।

किस जिले में कितने झरने? (लघु सिंचाई विभाग के आंकड़े):

लघु सिंचाई विभाग द्वारा राज्य के सभी 13 जिलों में किए जा रहे सर्वे में अब तक कुल 42,553 झरने रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। जिलावार आंकड़े इस प्रकार हैं:

जिलादर्ज किए गए झरनों की संख्या
अल्मोड़ा9,600+ (9,450 ग्रामीण, 181 शहरी)
चमोली8,077
टिहरी4,415 (4,412 ग्रामीण, 3 शहरी)
उत्तरकाशी4,191
चंपावत3,911
पौड़ी3,143
पिथौरागढ़2,821
बागेश्वर2,339
रुद्रप्रयाग2,268
देहरादून1,046 (मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र)
नैनीताल711

हिमोत्थान संस्था का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन

सरकारी सर्वे के साथ-साथ ‘हिमोत्थान’ संस्था भी भू-वैज्ञानिकों की मदद से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में जल स्रोतों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण कर रही है। संस्था ने वर्ष 2018 में नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन रिपोर्ट के बाद धरातल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए 2025 में यह स्वतंत्र काम शुरू किया था।

संस्था के शुरुआती अनुमान के अनुसार, केवल टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में ही 36 हजार से अधिक झरने और गाड़-गदेरे हो सकते हैं। अब तक संस्था द्वारा टिहरी में लगभग 5,500 और अल्मोड़ा में करीब 6,000 झरनों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है।


क्यों जरूरी है यह गणना?

जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और कृषि गतिविधियों में आ रहे बदलावों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। सही और आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में अब तक जल संरक्षण की योजनाएं प्रभावी रूप से काम नहीं कर पा रही थीं।

“यह राज्य में अपनी तरह का पहला व्यापक अभियान है जो भारत सरकार के सहयोग से चलाया जा रहा है। अगले एक महीने में इसे पूरा कर लिया जाएगा। इस प्रामाणिक डेटा के आधार पर ही भविष्य में जल संरक्षण, वाटर रिचार्ज और सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की योजनाएं तैयार की जा सकेंगी।”— बी.के. तिवारी, मुख्य अभियंता, लघु सिंचाई विभाग

“ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी करीब 80 प्रतिशत आबादी प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। पिछले दस वर्षों में कई स्थानों पर झरने पूरी तरह सूख चुके हैं या उनका प्रवाह कम हुआ है। स्थानीय लोगों के सहयोग से हम इन जल स्रोतों के इतिहास और बदलावों की जानकारी भी जुटा रहे हैं।”— निखिल, भू-वैज्ञानिक, हिमोत्थान संस्था

यह सर्वेक्षण पूरा होने के बाद पहली बार देश और राज्य के पास एक ऐसा डिजिटल मानचित्र और डेटाबेस उपलब्ध होगा, जो भविष्य की जल सुरक्षा नीतियों को तय करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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