देहरादून, 1 जून।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बहने वाले झरने और गाड़-गदेरे (पहाड़ी जलधाराएं) सदियों से स्थानीय जीवन, पेयजल और खेती का मुख्य आधार रहे हैं। हालांकि, आज तक सरकार के पास इन प्राकृतिक जल स्रोतों का कोई आधिकारिक और व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। अब देश में पहली बार झरनों की व्यवस्थित गणना का काम किया जा रहा है। उत्तराखंड में यह महत्वपूर्ण अभियान लघु सिंचाई विभाग और हिमोत्थान संस्था द्वारा संयुक्त व स्वतंत्र रूप से चलाया जा रहा है। यह सर्वे अब अपने अंतिम चरण में है और अगले एक महीने के भीतर इसके पूरे होने की उम्मीद है।
पर्वतीय क्षेत्रों की स्थानीय भाषा में ‘गाड़’ और ‘गदेरे’ का अर्थ प्राकृतिक जल धाराओं से होता है:
लघु सिंचाई विभाग द्वारा राज्य के सभी 13 जिलों में किए जा रहे सर्वे में अब तक कुल 42,553 झरने रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। जिलावार आंकड़े इस प्रकार हैं:
| जिला | दर्ज किए गए झरनों की संख्या |
| अल्मोड़ा | 9,600+ (9,450 ग्रामीण, 181 शहरी) |
| चमोली | 8,077 |
| टिहरी | 4,415 (4,412 ग्रामीण, 3 शहरी) |
| उत्तरकाशी | 4,191 |
| चंपावत | 3,911 |
| पौड़ी | 3,143 |
| पिथौरागढ़ | 2,821 |
| बागेश्वर | 2,339 |
| रुद्रप्रयाग | 2,268 |
| देहरादून | 1,046 (मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र) |
| नैनीताल | 711 |
सरकारी सर्वे के साथ-साथ ‘हिमोत्थान’ संस्था भी भू-वैज्ञानिकों की मदद से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में जल स्रोतों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण कर रही है। संस्था ने वर्ष 2018 में नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन रिपोर्ट के बाद धरातल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए 2025 में यह स्वतंत्र काम शुरू किया था।
संस्था के शुरुआती अनुमान के अनुसार, केवल टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में ही 36 हजार से अधिक झरने और गाड़-गदेरे हो सकते हैं। अब तक संस्था द्वारा टिहरी में लगभग 5,500 और अल्मोड़ा में करीब 6,000 झरनों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है।
जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और कृषि गतिविधियों में आ रहे बदलावों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। सही और आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में अब तक जल संरक्षण की योजनाएं प्रभावी रूप से काम नहीं कर पा रही थीं।
“यह राज्य में अपनी तरह का पहला व्यापक अभियान है जो भारत सरकार के सहयोग से चलाया जा रहा है। अगले एक महीने में इसे पूरा कर लिया जाएगा। इस प्रामाणिक डेटा के आधार पर ही भविष्य में जल संरक्षण, वाटर रिचार्ज और सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की योजनाएं तैयार की जा सकेंगी।”— बी.के. तिवारी, मुख्य अभियंता, लघु सिंचाई विभाग
“ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी करीब 80 प्रतिशत आबादी प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। पिछले दस वर्षों में कई स्थानों पर झरने पूरी तरह सूख चुके हैं या उनका प्रवाह कम हुआ है। स्थानीय लोगों के सहयोग से हम इन जल स्रोतों के इतिहास और बदलावों की जानकारी भी जुटा रहे हैं।”— निखिल, भू-वैज्ञानिक, हिमोत्थान संस्था
यह सर्वेक्षण पूरा होने के बाद पहली बार देश और राज्य के पास एक ऐसा डिजिटल मानचित्र और डेटाबेस उपलब्ध होगा, जो भविष्य की जल सुरक्षा नीतियों को तय करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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