
टिहरी गढ़वाल: उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में जहां पानी की कमी, जंगली जानवरों के आतंक और सुविधाओं के अभाव के चलते लोग खेती छोड़ शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, वहीं टिहरी गढ़वाल के एक पूर्व सैनिक ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया है। नरेंद्रनगर ब्लॉक के गजा क्षेत्र स्थित गौसारी गांव निवासी रिटायर्ड ऑनरेरी नायब सूबेदार मान सिंह चौहान ने महज 4 कीवी के पौधों से बागवानी की शुरुआत कर पहाड़ में स्वरोजगार और ‘रिवर्स पलायन’ की एक नई मिसाल पेश की है।
26 साल सेना में सेवा के बाद चुनी बागवानी की राह
मान सिंह चौहान भारतीय सेना में 26 साल तक देश की सेवा करने के बाद वर्ष 2005 में ऑनरेरी नायब सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने शहर में बसने के बजाय अपने पैतृक गांव में रहकर कुछ नया करने की ठानी।
पारंपरिक फसलों में ज्यादा मेहनत और कम मुनाफे को देखते हुए उन्होंने साल 2014 में नकदी फसल उगाने का फैसला किया। उनका लक्ष्य कम जमीन में बेहतर आमदनी हासिल करना था, जिसके बाद उन्होंने कीवी की खेती का रुख किया और परीक्षण के तौर पर अपने खेत में सिर्फ चार पौधे लगाए।
चार पौधों से विशाल बागान तक का सफर
मान सिंह चौहान बताते हैं कि शुरुआत में पौधों की देखभाल, पहाड़ी जलवायु के अनुकूल प्रबंधन और बाजार तक पहुंच जैसी कई दिक्कतें सामने आईं। लेकिन उन्होंने सेना के अनुशासन और धैर्य के साथ कीवी उत्पादन की बारीकियों व आधुनिक तकनीकों को समझा।
लगातार की गई मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे उन्होंने अपने बागान का दायरा बढ़ाया। आज उनके बगीचे में कीवी का भरपूर उत्पादन हो रहा है।
चुनौतियों को दी मात, अब दे रहे स्थानीय लोगों को रोजगार
पहाड़ों में खेती को लेकर मान सिंह का कहना है कि मौसम की मार, सिंचाई का अभाव और बंदरों व जंगली सुअरों से फसल की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसके बावजूद सुनियोजित देखभाल से उन्होंने इन बाधाओं को पार किया।
- सीजनल कमाई: पिछले तुड़ाई सीजन (अक्टूबर से दिसंबर) में उन्हें कीवी की बिक्री से ₹50,000 से अधिक की शुद्ध आय हुई।
- रोजगार सृजन: अपने इस उद्यम के जरिए वह गांव के 2 से 3 अन्य स्थानीय लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।
सफलता का मंत्र: ‘पारंपरिक खेती के साथ अपनाएं आधुनिक फल उत्पादन’
पूर्व सैनिक मान सिंह चौहान के अनुसार, पहाड़ों में खेती को घाटे का सौदा मानकर छोड़ना सही नहीं है। सफलता के लिए जमीन से ज्यादा जरूरी आधुनिक कृषि तकनीक, सही फसल चयन और बाजार की मांग को समझना है।
उनका मानना है कि यदि उत्तराखंड के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ कीवी, सेब और अन्य उच्च मूल्य वाले (High-Value) फलों के उत्पादन को अपनाएं, तो गांव में रहकर ही लाखों की कमाई की जा सकती है।
पहाड़ के लिए एक प्रेरणा
मान सिंह चौहान की यह पहल यह साबित करती है कि उत्तराखंड की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां बागवानी के लिए बेहद अनुकूल हैं। यदि किसानों को समय पर सरकारी प्रोत्साहन, तकनीकी प्रशिक्षण और उचित बाजार मिल जाए, तो पहाड़ से होने वाले पलायन पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
