द्वारिका नगरी अपनी भव्यता और शांति के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी। वहां बलराम जी और श्री कृष्ण सुखपूर्वक निवास कर रहे थे। बलराम जी, जो शेषनाग के अवतार माने जाते थे, अपनी असीम शक्ति और गदा युद्ध में निपुणता के लिए विख्यात थे।
एक समय की बात है, पौंड्रक राजा द्वारा भेजा गया ‘द्वीत’ (द्विविद) नाम का एक मायावी और विशालकाय वानर द्वारिका के आसपास उत्पात मचा रहा था। बलराम जी का सामना जब उस असुर से हुआ, तो उन्होंने अपनी भुजाओं के बल का प्रदर्शन करते हुए उसे मात्र एक ही मुक्के में धराशायी कर दिया और उसका वध कर दिया। द्वीत जैसे शक्तिशाली असुर को इतनी आसानी से मारने के बाद बलराम जी के मन में अपने बल को लेकर सूक्ष्म अहंकार ने जन्म ले लिया। उन्हें लगने लगा कि त्रिभुवन में उनकी भुजाओं, गदा और हल का सामना करने वाला कोई नहीं है। उनका यह अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच चुका था।
त्रिकालदर्शी श्री कृष्ण अपने बड़े भाई के मन में पनप रहे इस अहंकार को भांप गए। वे जानते थे कि अहंकार ज्ञान और भक्ति का शत्रु है। अतः उन्होंने बलराम जी का भ्रम तोड़ने के लिए एक लीला रची। श्री कृष्ण ने मन ही मन अपने परम भक्त हनुमान जी का स्मरण किया और उन्हें गंधमादन पर्वत से द्वारिका आने का आदेश दिया।
आज्ञा पाकर पवनपुत्र हनुमान वायु वेग से उड़ते हुए द्वारिका पहुंचे और सीधे राजमहल की सबसे सुंदर शाही वाटिका में प्रवेश कर गए। यह वाटिका बलराम जी और श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय थी। हनुमान जी ने वहां ठीक उसी तरह का व्यवहार करना शुरू कर दिया, जैसा उन्होंने त्रेतायुग में रावण की अशोक वाटिका में किया था। वे फलों को खाने के बजाय वृक्षों को जड़ सहित उखाड़कर फेंकने लगे, सरोवरों को गंदा करने लगे और पूरी वाटिका को उजाड़ने लगे।
वाटिका के रक्षकों ने जब एक वानर को ऐसा करते देखा, तो वे उसे रोकने दौड़े। परंतु, वे साधारण सैनिक उस महाबली हनुमान के सामने कहां टिकने वाले थे? हनुमान जी ने खेल-खेल में ही उन सभी को खदेड़ दिया। घबराए हुए सैनिकों ने जाकर बलराम जी को सूचना दी, “महाबली! एक विशाल वानर हमारी शाही वाटिका में घुस आया है और भारी उत्पात मचा रहा है। हम उसे रोकने में असमर्थ हैं।”
यह सुनकर बलराम जी क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने सैनिकों को डांटते हुए कहा, “धिक्कार है तुम पर! तुम सब मिलकर एक तुच्छ वानर को नहीं भगा सके?” सैनिकों ने कांपते हुए उत्तर दिया, “प्रभु, वह कोई साधारण वानर नहीं लगता, उसका बल हम सबसे कहीं अधिक है।”
अपने बल के मद में चूर बलराम जी ने सैनिकों को हटाया और खुद अपनी गदा उठाकर वाटिका की ओर चल पड़े। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि एक वानर मजे से पेड़ उखाड़ रहा है। बलराम जी ने उसे चेतावनी दी और वहां से भाग जाने को कहा। लेकिन हनुमान जी ने उनकी बात अनसुनी कर दी और अपनी लीला जारी रखी।
क्रोधित बलराम जी ने हनुमान जी पर अपनी गदा से प्रहार किया। इसके बाद दोनों के बीच भीषण गदा युद्ध शुरू हो गया। बलराम जी ने अपने सारे दांव-पेच लगा दिए, अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग कर लिया, लेकिन वह उस वानर को एक इंच भी पीछे नहीं हटा सके। प्रहार करते-करते बलराम जी पसीने से लथपथ हो गए और बुरी तरह हांफने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि द्वीत जैसे असुर को एक मुक्के में मारने वाला उनका बल आज व्यर्थ क्यों जा रहा है?
अंततः, थक-हारकर और हताश होकर बलराम जी ने युद्ध रोका और क्रोधित स्वर में पूछा, “सच बता वानर, तू कौन है? अगर तूने अपनी असली पहचान नहीं बताई, तो मैं अब अपनी गदा रखकर अपना ‘हल’ (संवर्तक हल) निकाल लूंगा।”
हल का नाम सुनते ही हनुमान जी ने मन ही मन श्री कृष्ण का ध्यान किया और संदेश भेजा, “प्रभु! इन्होंने तो अब हल निकालने की ठान ली है। अगर हल चल गया तो अनर्थ हो जाएगा। अब आप ही बताएं मैं क्या करूं?”
हनुमान जी की पुकार सुनते ही, तत्काल वहां भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी प्रकट हुए। श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने बड़े भाई को रोका और कहा, “दाऊ! शांत हो जाइये। आप जिनसे युद्ध कर रहे हैं, वे कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि रुद्र अवतार और मेरे परम भक्त ‘पवनपुत्र हनुमान’ हैं।”
यह सुनते ही बलराम जी के हाथ से गदा छूट गई। वे आश्चर्यचकित रह गए कि वे साक्षात हनुमान जी से युद्ध कर रहे थे। उसी क्षण उनका सारा अहंकार पानी की तरह बह गया। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। बलराम जी ने न केवल हनुमान जी से क्षमा मांगी, बल्कि यह भी स्वीकार किया कि असुर द्वीत को मारने के बाद उन्हें अपनी शक्ति पर घमंड हो गया था, जिसे आज हनुमान जी ने तोड़ दिया।
इस प्रकार, श्री कृष्ण की लीला से बलराम जी का अहंकार भी मिट गया और द्वारिका में एक बार फिर भक्ति और प्रेम का वातावरण स्थापित हो गया।
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