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विधानसभा बर्खास्तगी मामला: हाईकोर्ट में सुनवाई, नियुक्ति के अधिकार और नियमों पर आमने-सामने आए दोनों पक्ष

नैनीताल: उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त किए गए कर्मचारियों के मामले में गुरुवार (2 जुलाई) को उत्तराखंड हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान बर्खास्त कर्मचारियों और विधानसभा सचिवालय की ओर से जोरदार दलीलें पेश की गईं. कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई को जारी रखा है और अगली सुनवाई के लिए 16 जुलाई की तिथि निर्धारित की है.

सचिवालय ने दी दलील- ‘बिना विज्ञप्ति के बैकडोर से दी गईं नौकरियां’

सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सचिवालय में जितनी भी नियुक्तियां की गई थीं, वे पूरी तरह अवैध थीं. विधानसभा सचिवालय के अनुसार, नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर बिना किसी सार्वजनिक विज्ञप्ति (विज्ञापन) जारी किए कुल 228 लोगों को बैकडोर से नौकरियां दे दी गईं. सचिवालय का तर्क था कि विधानसभा अध्यक्ष को इस तरह सीधे नियुक्तियां करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए नियमों के तहत इन अवैध नियुक्तियों को निरस्त कर कर्मचारियों को सेवा से हटाया गया है.

बर्खास्त कर्मचारियों का पक्ष- ‘नियुक्ति वैध थी और सेवा समाप्ति प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध’

दूसरी ओर, बर्खास्त कर्मचारियों की ओर से पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देव दत्त कामत, वरिष्ठ अधिवक्ता वीबीएस नेगी, वरिष्ठ अधिवक्ता केपी उपाध्याय और रविंद्र बिष्ट ने इन दलीलों का विरोध किया. याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उनकी नियुक्तियां पूरी तरह वैध थीं और विधानसभा अध्यक्ष के पास नियुक्तियां करने का पूर्ण अधिकार है.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सितंबर 2022 में उनकी सेवाएं समाप्त करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया. उन्हें अपनी बात रखने का कोई अवसर (सुनवाई का मौका) नहीं दिया गया और न ही बर्खास्तगी आदेश में उन्हें हटाने का कोई ठोस कारण स्पष्ट किया गया. कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने नियमित कर्मचारियों की तरह सचिवालय में सालों तक सेवाएं दी हैं, इसलिए एक साथ इतने कर्मचारियों को बर्खास्त करना लोकहित के खिलाफ और विधि सम्मत नहीं है.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, साल 2022 में उत्तराखंड विधानसभा में बैकडोर नियुक्तियों का विवाद सामने आने के बाद तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लोकहित का हवाला देते हुए 27, 28 और 29 सितंबर 2022 को कुल 228 तदर्थ (Ad-hoc) कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. इस बर्खास्तगी आदेश को बबीता भंडारी, भूपेंद्र सिंह बिष्ट और कुलदीप सिंह समेत अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट की एकलपीठ में चुनौती दी है.

याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि साल 2001 से 2015 के बीच भी विधानसभा में 396 पदों पर इसी तरह तदर्थ नियुक्तियां हुई थीं, जिन्हें बाद में नियमित कर दिया गया था. वहीं, साल 2014 तक नियुक्त हुए कर्मचारियों को महज 4 साल से कम की सेवा में नियमित कर दिया गया, लेकिन उन्हें 6 साल से अधिक समय तक सेवा देने के बावजूद नियमित करने के बजाय अचानक नौकरी से निकाल दिया गया.

कर्मचारियों के अनुसार, साल 2018 में भी एक जनहित याचिका के दौरान कोर्ट ने उनकी नियुक्तियों को वैध माना था. अब इस मामले में आगामी 16 जुलाई को होने वाली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण होगी, जिसमें दोनों पक्षों की ओर से और विस्तृत दलीलें पेश की जा सकती हैं.

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