देहरादून:हिमालयी क्षेत्रों में मौसम के बदलते पैटर्न ने पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले एक महीने से हिमालय में बर्फबारी (Snowfall) न होने के कारण एक असामान्य स्थिति पैदा हो गई है। आमतौर पर साल के इस समय बर्फ की सफेद चादर में लिपटी रहने वाली केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के आसपास की पहाड़ियां पूरी तरह से बर्फविहीन (Snowless) नजर आ रही हैं।
बर्फ के इंतजार में सूखी पहाड़ियां
स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के अनुसार, जहाँ इस मौसम में इन ऊंचाई वाले इलाकों में कई फीट बर्फ जमी रहती थी, वहां अभी केवल सूखी और भूरी चट्टानें ही दिखाई दे रही हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, औली और मुनस्यारी जैसे प्रमुख स्थानों पर भी बर्फबारी का लंबा इंतजार चल रहा है। पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) के कमजोर रहने के कारण बारिश और बर्फबारी की यह कमी देखी जा रही है।
दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए बज गई खतरे की घंटी
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बर्फबारी में हो रही यह देरी हिमालय की जैव-विविधता, विशेषकर दुर्लभ जड़ी-बूटियों (Rare Medicinal Herbs) के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है:
वैज्ञानिकों की राय
वनस्पति वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बर्फबारी नहीं हुई, तो अल्पाइन मेडिसिनल प्लांट्स की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है। यह न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बुरा संकेत है, बल्कि उन स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी असर डालेगा जो इन जड़ी-बूटियों के संग्रह पर निर्भर हैं।
आगामी संकट
बर्फबारी न होने का असर केवल जड़ी-बूटियों तक सीमित नहीं रहेगा। सर्दियों में कम बर्फबारी का सीधा अर्थ है कि गर्मियों में ग्लेशियरों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलेगा, जिससे गंगा और यमुना जैसी नदियों के जलस्तर में कमी आ सकती है और मैदानी इलाकों में जल संकट गहरा सकता है।
फिलहाल, मौसम विभाग और स्थानीय लोग आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं, इस उम्मीद में कि जल्द ही हिमालय अपनी श्वेत चादर ओढ़ेगा और प्राकृतिक संतुलन फिर से बहाल होगा।
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