सुनीत द्विवेदी : उत्तराखंड में बूढ़ी या देव दीपावली को इगास पर्व के रूप में मनाने की परंपरा है। इस पर्व के दिन सुबह मीठे पकवान बनाए जाते हैं। स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के बाद रात में भैलो नृत्य किया जाता है। भैलो को तिल, भंगजीरे, हिसर और चीड़ की सूखी लकड़ी के छोटे-छोटे गर्ठर बनाकर, हरी घास से बुनी विशेष रस्सी से बांधकर तैयार किया जाता है। इससे आग लगने पर भी रस्सी जल्दी नहीं जलती है। लोग समूह में भैलो खेलते हैं। इसको लेकर सुबह से ही कौतूहल का माहौल रहता है। लोग रस्सियां बुनते हैं। भैलो तैयार करते है। इसका तिलक किया जाता है। अंधेरे में आग के गोले से करतब करते लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। लोग पारंपरिक लोक नृत्य चांछड़ी और झुमेलों के साथ भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू आदि लोक गीतों का मांगल करते हैं। देवी-देवताओं की जागर भी गाई जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी सभी कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। पहाड़ में त्योहार मनाने के पीछे एक अन्य मान्यता है कि टिहरी के राजा महीपति शाह के सेनापति माधो सिंह भंडारी करीब 400 साल पहले तिब्बत से युद्ध लड़ने गए थे। काफी दिनों तक कोई सैनिक वापस नहीं आया। लोगों को लगा कि माधो सिंह और उनके सैनिक युद्ध में शहीद हो गए। उन्होंने उस वर्ष दीपावली नहीं मनाई, लेकिन दिवाली के बाद एकादशी पर माधो सिंह युद्ध जीतकर अपने सैंनिकों के साथ लौट आए। उनके लौटने की खुशी में लोगों ने एकादशी का त्योहार दीपावली की तरह धूमधाम से मनाया। माना जाता है कि तभी से पहाड़ों में ‘इगास’ पर्व मनाया जाने लगा। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि हरिबोधनी एकादशी यानी इगास पर्व पर श्रीहरि शयनावस्था से जागृत होते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। उत्तराखंड में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से ही दीप पर्व शुरू हो जाता है, जो कि कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी हरिबोधनी एकादशी तक चलता है। इस कारण इसे देवउठनी एकादशी भी कहा गया। इसे गढ़वाल में इगास और कुमाऊं में बग्वाल कहा जाता है। इस दिन सुबह से लेकर दोपहर तक गोवंश की पूजा की जाती है। मवेशियों के लिए भात, झंगोरा, बाड़ी, मंडुवे आदि से आहार तैयार किया जाता है। सबसे पहले मवेशियों के पांव धोए जाते हैं और फिर दीप एवं धूप जलाकर उनकी पूजा की जाती हैं। माथे पर हल्दी का टीका और सींगों पर सरसों का तेल लगाकर उन्हें परात में फूलों से सजाकर अन्न ग्रास दिया जाता है। घरों में स्वाली, पकोड़ी, भूड़ा पकवान बनाए जाते हैं।
(साभार: अमर उजाला में 10 नवंबर 2024 को दिल्ली से प्रकाशित लेख)
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