UTTARAKHAND

बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले जोशीमठ में ‘त्रिमुडिया मेले’ का आयोजन; सदियों पुरानी परंपरा के साथ चढ़ाया गया भोग

जोशीमठ (चमोली):
उत्तराखंड में अक्षय तृतीया के अवसर पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा का विधिवत आगाज हो गया है। इसी कड़ी में अब बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है। इसी उपलक्ष्य में जोशीमठ स्थित प्रसिद्ध नरसिंह मंदिर में पौराणिक त्रिमुडिया मेले का भव्य और हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों ने भाग लिया।

क्या है पौराणिक मान्यता?

त्रिमुडिया मेले का संबंध एक प्राचीन और रोचक पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में पीपलकोटी के पास ‘ह्यूणा’ नामक स्थान पर त्रिमुडिया वीर का आतंक था, जो नरबलि लिया करता था। तब मां दुर्गा ने उसे युद्ध में परास्त कर अपने वश में किया और जोशीमठ ले आईं।

माता दुर्गा ने त्रिमुडिया वीर के सामने यह शर्त रखी कि उसे नरबलि के स्थान पर हर वर्ष बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले बकरे, कच्चे चावल और गुड़ का भोग लगाया जाएगा। तभी से देव पूजाई समिति के तत्वावधान में इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। इसी कड़ी में रविवार को उग्रवीर देवता को विधिवत भोग अर्पित कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की गई।

भक्तिमय वातावरण और ‘पश्वा’ नृत्य

मेले के दौरान विभिन्न देवी-देवताओं के पश्वा (देवता के अवतार) अवतरित हुए, जिन्हें देखकर पूरा परिसर भक्तिमय हो उठा। देवताओं ने भक्तों को आशीर्वाद दिया और क्षेत्र की खुशहाली का वरदान दिया। इस आयोजन में रैंकवाल पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जो माता दुर्गा का ‘आलम’ (प्रतीक) त्रिमुडिया वीर के लिए लेकर आए।

प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति

धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न कराने में कई प्रमुख लोगों ने सहयोग किया:

  • समिति के पदाधिकारी: अध्यक्ष अनिल नंबूदरी, उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र सती, सचिव प्रकाश नेगी और कोषाध्यक्ष आशीष चंद्र सती।
  • रैंकवाल पंचायत: अध्यक्ष अनूप नेगी, उपाध्यक्ष सोहन सिंह बैजवाणी और सचिव सुभाष पंवार।
  • देव पश्वा: दुर्गा जी के पश्वा भोला सिंह नामण, भुवनेश्वरी के पश्वा आदित्य भूषण सती, चंडिका जी के पश्वा प्रकाश नेगी, दाणी माता के पश्वा अंकित मेहरा और त्रिमुडिया के पश्वा कन्हैया बेजवाड़ी।

बदरीनाथ यात्रा की तैयारियां तेज

त्रिमुडिया मेले के सफल समापन के साथ ही अब बदरी विशाल के कपाट खुलने की तैयारियां अपने अंतिम चरण में पहुँच गई हैं। जोशीमठ से लेकर बदरीनाथ धाम तक श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। प्रशासन और मंदिर समिति अब पूरी तरह से बदरीनाथ धाम के कपाटोद्घाटन की तैयारियों में जुट गई है।

क्या है त्रिमुडिया वीर की कहानी?

उत्तराखंड में गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुल चुके हैं। अब सबकी नजरें ‘बदरी विशाल’ पर हैं। लेकिन भगवान बदरीनाथ के कपाट खुलने से पहले जोशीमठ में एक बेहद महत्वपूर्ण और पौराणिक परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘त्रिमुडिया मेला’ कहते हैं।जोशीमठ के ऐतिहासिक नरसिंह मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी त्रिमुडिया मेले का भव्य आयोजन हुआ। यह मेला सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि बदरीनाथ यात्रा के विधिवत शुरू होने का एक संकेत है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में पीपलकोटी के पास ‘ह्यूणा’ नामक स्थान पर ‘त्रिमुडिया वीर’ का आतंक था। वह इतना शक्तिशाली और क्रूर था कि लोगों से नरबलि (इंसानों की बलि) लिया करता था। पूरा इलाका उसके खौफ से कांपता था।

जब पाप बढ़ गया, तब माँ दुर्गा ने रौद्र रूप धारण किया और त्रिमुडिया वीर को युद्ध में परास्त कर उसे अपने वश में कर लिया। माँ दुर्गा उसे अपने साथ जोशीमठ ले आईं, लेकिन वीर को शांत करने के लिए एक व्यवस्था बनाई गई।माँ दुर्गा ने त्रिमुडिया वीर के सामने शर्त रखी कि उसे अब नरबलि नहीं मिलेगी। इसके बदले, हर साल बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से ठीक पहले उसे बकरे, कच्चे चावल और गुड़ का सात्विक भोग लगाया जाएगा। तभी से यह परंपरा ‘त्रिमुडिया मेले’ के रूप में चली आ रही है।

इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता है—देवी-देवताओं का अवतरण। मेले के दौरान माँ दुर्गा, चंडिका, भुवनेश्वरी और त्रिमुडिया वीर के पश्वा (वे व्यक्ति जिनमें देवता आते हैं) नृत्य करते हैं। भारी जनसमूह के बीच ये पश्वा भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

इस परंपरा को निभाने में रैंकवाल पंचायत और देव पूजाई समिति की मुख्य भूमिका होती है। वे माता दुर्गा का प्रतीक (आलम) लेकर आते हैं और पूरे विधि-विधान से उग्रवीर देवता को भोग अर्पित करते हैं।

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