रुद्रप्रयाग/केदारनाथ।
विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन ने एक नई पहल शुरू की है। हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी के बीच बसे इस पावन तीर्थस्थल को प्लास्टिक और सूखे कचरे से मुक्त रखने के उद्देश्य से ‘कैरी मी बैक पॉलिसी’ (Carry Me Back Policy) लागू की जा रही है।
जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग विशाल मिश्रा के मार्गदर्शन में यह अनूठी पहल नगर पंचायत केदारनाथ द्वारा हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से संचालित की जाएगी।
चारधाम यात्रा के दौरान प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचते हैं[1]। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के आने से वहां प्लास्टिक की बोतलें, पैकेजिंग सामग्री, रैपर और अन्य सूखा कूड़ा बड़ी मात्रा में इकट्ठा हो जाता है[1]।
समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस कचरे का समय पर और उचित तरीके से निस्तारण करना प्रशासन के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है[1]। इसी चुनौती का स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल समाधान निकालने के लिए ‘कैरी मी बैक पॉलिसी’ को धरातल पर उतारा जा रहा है[1]।
नई व्यवस्था के तहत केदारनाथ आने वाले श्रद्धालुओं को नगर पंचायत की ओर से लगभग 400 से 500 ग्राम क्षमता वाले विशेष बैग उपलब्ध कराए जाएंगे[1]।
इस महत्वाकांक्षी अभियान को सफल बनाने के लिए तीन अलग-अलग स्तरों पर जिम्मेदारियां तय की गई हैं[1]:
उपजिलाधिकारी (SDM) ऊखीमठ एवं प्रभारी अधिकारी नगर पंचायत केदारनाथ के निर्देशन में संचालित यह अभियान केवल कूड़ा प्रबंधन तक सीमित नहीं है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं में पर्यावरणीय चेतना विकसित करना है। अधिकारी चाहते हैं कि बाबा केदार के दर्शन के साथ-साथ श्रद्धालु अपने साथ हिमालय की स्वच्छता और प्रकृति संरक्षण का एक सकारात्मक संदेश भी लेकर लौटें।
जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने कहा, “स्वच्छ केदारनाथ, सुरक्षित हिमालय और संरक्षित पर्यावरण का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब देश-विदेश से आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु अपनी जिम्मेदारी समझे और इस मुहिम का सक्रिय हिस्सा बने।” प्रशासन ने सभी श्रद्धालुओं, स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों और यात्रा से जुड़े हितधारकों से इस अभियान में बढ़-चढ़कर सहयोग करने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केदारनाथ धाम का यह ‘कैरी मी बैक’ मॉडल सफल रहता है, तो भविष्य में इसे अन्य हिमालयी तीर्थस्थलों और पर्यटन क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा, जिससे संवेदनशील पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
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