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अजब-गजब मुर्गा, जो 18 महीनों तक सिर कटे होने के बाद भी जीवित रहा!

देहरादून: क्या आपने कभी सोचा है कि क्या संभव है कि किसी जीव के सिर कटने के बाद भी वह जिंदा रह सकता है? इस सवाल को सुनते ही बहुत से लोग अविश्वासित हो जाते हैं, लेकिन अमेरिका में 78 साल पहले एक घटना घटी जो इस सवाल को एक नए दृष्टिकोण से देखने के लिए मजबूर कर देती है।

वहां, एक मुर्गा सिर कटने के बाद भी करीब 18 महीने तक जिंदा रहा था। इसकी कहानी इतनी अद्भुत थी कि लोग चौंक गए थे। जिंदगी और मौत के बीच इस असामान्य संघर्ष की कहानी ने लोगों के मन में अनेक प्रश्नों को उत्पन्न किया। इस अजीबोगरीब घटना का रहस्य क्या था? कैसे हो सकता है कि बिना सिर के कोई मुर्गा इतने लंबे समय तक जिंदा रह सकता है?

इस मुर्गे को ‘मिरेकल माइक’ नाम दिया गया था। 10 सितंबर 1945 को कोलाराडो के फ्रूटा में रहने वाले किसान लॉयड ओल्सेन अपनी पत्नी क्लारा के साथ अपने फार्म पर मुर्गे-मुर्गियों को काट रहे थे। उन्होंने कई मुर्गे-मुर्गियां काटी। इस दौरान लॉयड ने साढ़े पांच महीने के एक मुर्गे का सिर काटा, जिसका नाम माइक था, लेकिन उन्हें हैरानी तब हुई जब वह मुर्गा मरा नहीं बल्कि बिना सिर के ही दौड़े जा रहा था। इसके बाद उन्होंने उसे एक बक्से में बंद कर दिया, लेकिन अगली सुबह जब उठकर देखा तो वह जिंदा ही था।  बिना सिर के मुर्गे के जिंदा रहने की खबर धीरे-धीरे पूरे फ्रूटा में और उसके बाद अमेरिका के कई शहरों में भी फैल गई। कहते हैं कि साल्ट लेक सिटी में स्थित यूटा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए कई मुर्गों के सिर काट दिए थे कि बिना सिर के वो जिंदा रहते हैं या नहीं, लेकिन माइक जैसी खूबी उन्हें किसी भी मुर्गे में नहीं मिली। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिना सिर वाले इस मुर्गे को ड्रॉप से जूस वगैरह दिया जाता था और उसकी भोजन नली को सीरिंज से साफ किया जाता था, ताकि उसका दम न घुटे। हालांकि मार्च 1947 में उसकी मौत हो गई। इसकी वजह बताई जाती है कि लॉयड ओल्सेन उसे जूस देने के बाद उसकी भोजन नली को सीरिंज से साफ नहीं कर पाए थे, क्योंकि वो सीरिंज को कहीं दूसरी जगह भूल कर आ गए थे। इसी वजह से माइक की दम घुटने से मौत हो गई थी।  आज फ्रूटा में हर साल ‘हेडलेस चिकन’ महोत्सव मनाया जाता है। इसकी शुरुआत साल 1999 में हुई थी। इस महोत्सव में हजारों लोग शामिल होते हैं, जिसमें कई तरह की प्रतियोगिताएं होती हैं और यहां तक कि गाने-बजाने का भी कार्यक्रम होता है। 

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