सड़कों पर सवाल, वेंटिलेटर पर सिस्टम!

"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
महाभारत में एक प्रसंग आता है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन हताश होकर धनुष रख देते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हैं कि अन्याय के खिलाफ न बोलना भी अपराध का ही एक रूप है। लेकिन, आज जब मैं दिल्ली की सड़कों की तरफ देखता हूं, तो मन पूछ बैठता है, हमारे देश के नौजवान धनुष रखकर घर नहीं बैठे, वे हाथ में किताबें और तख्तियां लेकर सड़कों पर अड़ गए। और अंततः, हुक्मरानों को झुकना ही पड़ा।
साधो! जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक महीनों से जो धुआं, शोर और अनशन की आंच हवा में तैर रही थी, उसने आखिरकार सत्ता के अहंकार को पिघला दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो चुका है और कॉकरोच जनता पार्टी तथा सोनम वांगचुक का ऐतिहासिक धरना भी खत्म हो गया है। लेकिन, सवाल यह है कि क्या एक मंत्री के कुर्सी छोड़ देने या बैरिकेड्स हट जाने से उस व्यवस्था के घाव भर गए हैं, जो वेंटिलेटर पर पड़ी है?
आइए, थोड़ा ठहरकर ठंडे दिल से उन तथ्यों पर बात करते हैं, जो इस पूरे घटनाक्रम के सबक हैं:–
इस्तीफा मिला, पर क्या भरोसा बहाल हुआ?: मई 2026 की नीट-यूजी परीक्षा में हुई धांधली के बाद 20 लाख से ज्यादा परिवारों का भविष्य अधर में लटक गया था। किसान का पसीना, मां के गिरवी रखे गहने और दो दर्जन से अधिक मासूमों की आत्महत्या के बाद जब युवाओं का जनाक्रोश सड़कों पर सैलाब बनकर उफन पड़ा, तब जाकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा आया। यह इस्तीफा किसी राजनीतिक दया का नतीजा नहीं, बल्कि देश के युवा की जीत है। पर बड़ा सवाल वही है, क्या संस्थाओं का खोया हुआ भरोसा केवल एक इस्तीफे से वापस लौट आएगा?
देर से जागी संवेदनहीन व्यवस्था: 20 जुलाई की उस तस्वीर को देश कैसे भूल सकता है, जब अपने अधिकारों की गुहार लगाने आए छात्रों पर लाठियां भांजी गईं, वॉटर कैनन चलाई गई और आंसू गैस के गोले छोड़े गए। 26 दिनों के कठिन अनशन और CJP के ऐतिहासिक आंदोलन के बाद जब सरकार को अपनी राजनीतिक साख खिसकती दिखी, तब जाकर मुकदमों की वापसी और वार्ता की मेज सजी। जो बात पहले दिन संवाद से सुलझ सकती थी, उसके लिए देश की भावी पीढ़ी को सड़कों पर खून और आंसू क्यों बहाने पड़े?
गांधीवादी सत्याग्रह की जीत: सोनम वांगचुक का अनशन टूटना और CJP द्वारा धरना समाप्त करने का फैसला यह साबित करता है कि लोकतंत्र में जब शांतिपूर्ण सत्याग्रह अपनी हदों को पार किए बिना अडिग रहता है, तो बड़ी से बड़ी सत्ता को झुकना पड़ता है। यह इस बात का प्रमाण है कि देश का युवा उपद्रवी नहीं, बल्कि जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति निष्ठावान है।
राजनीति का सबक: इस पूरे आंदोलन में सत्ता पक्ष जहां शुरुआत में इसे 'टूलकिट' और 'विदेशी साजिश' की आड़ में ढंकने की कोशिश करता रहा, वहीं विपक्ष अपनी जमीन तलाशता दिखा। लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर उमड़े इस गैर-राजनीतिक जनसैलाब ने साफ संदेश दे दिया है कि जब बात युवाओं के भविष्य की होगी, तो कोई भी दलगत चश्मा काम नहीं आएगा।
हमारे बुजुर्ग कहते थे, "जब घर का बच्चा रोने लगे, तो उसे थप्पड़ मारकर चुप कराने के बजाय यह देखना चाहिए कि उसे क्या तकलीफ है।"
सड़कों से धरना भले ही उठ गया हो और मंत्री का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया हो, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जैसी संस्थाओं की सड़न को साफ करना होगा।
"अगर हुक्मरान यह सोचते हैं कि एक इस्तीफे से पल्ला झाड़ लिया गया है, तो यह उनकी भूल होगी। व्यवस्था को अपने बंद दरवाजे हमेशा के लिए खोलने होंगे और युवाओं के साथ पारदर्शी संवाद की नई नींव रखनी होगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश का नौजवान जागा है, तब-तब व्यवस्था को बदलना ही पड़ा है।"
