उपलब्धियों का आसमान और यथार्थ की जमीन

80वें स्वतंत्रता दिवस पर विशेष
"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
लाल किले की प्राचीर से जब तिरंगा हवा के झोंकों के साथ लहराता है, तो सिर्फ एक ध्वज नहीं फहरता, बल्कि उस आसमान में एक पूरे राष्ट्र का स्वाभिमान उड़ान भरता है। 15 अगस्त 2026 को जब हम अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह सिर्फ कैलेंडर में लाल स्याही से दर्ज एक राष्ट्रीय अवकाश नहीं है। यह वह पावन तीर्थ है। जहां हम अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के सामने नतमस्तक होते हैं।
लेकिन, जब हम इस आज़ादी का जश्न मना रहे हैं, तो हमें एक पल ठहरकर सोचना होगा। क्या हम वाकई उन सपनों के भारत का निर्माण कर पाए हैं, जिन्हें लेकर हमारे पुरखों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे चूमे थे? आज हमें भावनाओं के साथ-साथ ठोस तथ्यों के धरातल पर भी अपना आकलन करना होगा।
आज जब हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इस हवा की कीमत भगत सिंह, गांधी, सुभाष, पटेल और अशफाकउल्ला खां जैसे नायकों ने अपने खून और आंसुओं से चुकाई है। उसी मजबूत नींव पर आज का आधुनिक भारत खड़ा है। बीते आठ दशकों में हमने जो हासिल किया है, वह दुनिया के लिए एक केस स्टडी है।
हम 4 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी का आंकड़ा पार कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर मजबूती से खड़े हैं। चंद्रयान-3 ने हमें चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बिठाया, सूर्य के अध्ययन के लिए 'आदित्य-एल1' स्थापित हो चुका है और 'गगनयान' के जरिए अंतरिक्ष में इंसान भेजने की हमारी तैयारी भारत की वैज्ञानिक मेधा का डंका बजा रही है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत विश्व गुरु बन चुका है। यूपीआई के जरिए हर महीने लगभग 1500 करोड़ से ज्यादा डिजिटल लेन-देन कर हम विकसित देशों को भी पीछे छोड़ चुके हैं।
वंदे भारत ट्रेनों का विस्तार और हर दिन औसतन 30 किलोमीटर से ज्यादा बन रहे राष्ट्रीय राजमार्ग देश की नई रफ्तार की गवाही दे रहे हैं।
लेकिन, क्या यह तस्वीर पूरी तरह मुकम्मल है? असली राष्ट्रभक्ति यह स्वीकार करने में है कि हमारी यात्रा अभी अधूरी है। जब हम तथ्यों के दूसरे पहलू को देखते हैं, तो कई गंभीर चुनौतियां हमारे सामने मुंह बाए खड़ी नजर आती हैं
विश्व असमानता रिपोर्ट जैसे अध्ययन हमें याद दिलाते हैं कि देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को विकास का सीधा लाभ नहीं मिलता, तब तक यह आज़ादी अपने गंतव्य तक नहीं पहुंची है।
भारत एक युवा देश है। हमारी लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। लेकिन इस 'जनसांख्यिकीय लाभांश' को एक कुशल वर्कफोर्स में बदलना और उनके लिए पर्याप्त रोजगार पैदा करना आज हमारी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।
हाल के वर्षों में हमने जिस तरह भीषण हीटवेव (लू), जल संकट और बेमौसम बाढ़ का सामना किया है, वह बताता है कि पर्यावरण संरक्षण अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की अनिवार्यता है।
आज के इस दौर में, जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 'डीपफेक' के युग में जी रहे हैं, सोशल मीडिया के आभासी संसार के जरिए नफरत और विभाजन की लकीरें गहरी करना बहुत आसान हो गया है। ऐसे वक्त में, भारत को अपना मूल चरित्र नहीं खोना चाहिए। हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी ‘अनेकता में एकता’ है। लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ पांच साल में एक बार ईवीएम का बटन दबाना नहीं है, बल्कि हर दिन एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करना, असहमति को जगह देना और संविधान की प्रस्तावना में लिखे मूल्यों को जीना है।
भारत अब 'अमृत काल' से गुजरते हुए 2047 की ओर कदम बढ़ा रहा है। आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ छतों और चौराहों पर झंडे न फहराएं, बल्कि अपने भीतर के उन अंधकारमय बंधनों को भी तोड़ें जो हमें एक बेहतर इंसान और एक जिम्मेदार नागरिक बनने से रोकते हैं।
आज़ादी कोई ऐसा खजाना नहीं है जिसे एक बार पा लिया तो हमेशा के लिए तिजोरी में बंद कर दिया जाए। आज़ादी एक जीवित पौधा है, जिसे हर नई पीढ़ी को अपनी मेहनत, ईमानदारी, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्र-प्रेम के पसीने से सींचना पड़ता है।
"हमारे पास एक महान विरासत है और एक उज्ज्वल भविष्य हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। शर्त बस इतनी है कि हम यथार्थ को स्वीकारें और अपने कदम एक साथ, एक दिशा में बढ़ाएं।
जय हिंद! जय भारत!"
