दहेज हत्या: असंवेदनशील समाज के चेहरे पर कालिख

दहेज हत्या: असंवेदनशील समाज के चेहरे पर कालिख
सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
हम 21वीं सदी के भारत में जी रहे हैं। डिजिटल इंडिया, चांद पर कदम और ग्लोबल पावर बनने का दंभ भरते हुए हमारा सीना चौड़ा हो जाता है। लेकिन, जरा ठहरिए और अपनी पीठ थपथपाना बंद कीजिए। इस चमचमाते आधुनिक भारत के पीछे एक ऐसा अंधकार है, जिसकी सड़ांध हमारे पूरे सामाजिक ताने-बाने को खोखला कर रही है।
यकीन न हो, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के इन ताजा और खौफनाक आंकड़ों को देख लीजिए। ये सिर्फ सूखे आंकड़े नहीं हैं, ये हमारी सामूहिक संवेदनशीलता के कत्ल के कानूनी दस्तावेज हैं। एक तरफ हम 'बेटी बचाओ' का नारा बुलंद करते हैं। और दूसरी तरफ हकीकत क्या है? सरकारी रिकॉर्ड गवाही दे रहे हैं। एक साल के भीतर इस देश में 5737 बहुओं को मौत के घाट उतार दिया गया।
हिसाब लगाइए, तो समझ आएगा कि हर दिन करीब 16 बेटियां, जो किसी घर की लक्ष्मी बनकर चौखट पार करती हैं, दहेज के लालच की बलि चढ़ जाती हैं। यानी हर डेढ़ घंटे में एक अर्थी उठ रही है।
आंकड़ों के मुताबिक, केवल दहेज हत्या ही नहीं, बल्कि 'पति और ससुराल वालों द्वारा क्रूरता' के सालाना 1 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हो रहे हैं। यानी हर 6 मिनट में एक महिला अपने ही घर में प्रताड़ित की जा रही है।
सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि अदालतों में दहेज हत्या के मामलों में सजा की दर महज 35 से 40 प्रतिशत के बीच है। यानी 60 फीसदी से ज्यादा हत्यारे साफ बच निकलते हैं। क्योंकि गवाह टूट जाते हैं या सिस्टम बिक जाता है।
कार चाहिए, फ्रिज चाहिए, नकद चाहिए... और क्या लाई हो? यह वो मानसिक बीमारी है, जो शादी के पवित्र मंडप को 'व्यापार की मंडी' में बदल देती है। लड़का क्या कमाता है, इससे ज्यादा इस बात पर मंडी सजती है कि लड़की वाले कितना 'चढ़ावा' चढ़ा रहे हैं। इंजीनियर है तो रेट अलग है। सरकारी बाबू है तो बोली दोगुनी है।
यह परंपरा नहीं, यह संगठित अपराध है। हम कितने पाखंडी समाज में रहते हैं? शादी के समय जो दूल्हा और उसका परिवार हाथ जोड़कर 'हमें कुछ नहीं चाहिए, बस आपकी बेटी चाहिए' का नाटक करता है। वो विदाई के कुछ ही दिन बाद भेड़िए में बदल जाता है। फ्रिज छोटा पड़ जाता है। गाड़ी का मॉडल पुराना लगने लगता है। नगद की भूख कभी शांत नहीं होती।
जब मांग पूरी नहीं होती, तो प्रताड़ना का वो खौफनाक दौर शुरू होता है। जो आखिरकार एक बंद कमरे में फंदे, पेट्रोल या जहर पर जाकर खत्म होता है। और हमारा कानून, हमारी पुलिस, हमारा समाज? वो इसे 'पारिवारिक विवाद' या 'आत्महत्या' का नाम देकर फाइलें बंद करने में जुट जाते हैं।
मन में सवाल उठता है। कसूरवार कौन है? वो पड़ोसी, जो बगल के घर से आती चीखें सुनकर भी अपनी खिड़कियां बंद कर लेते हैं कि यह उनका आपसी मामला है।या फिर वो माता-पिता, जो 'लोग क्या कहेंगे' और 'लड़की की अर्थी ही ससुराल से उठनी चाहिए' जैसी सड़ी-गली रूढ़ियों के डर से अपनी रोती हुई, पिटती हुई बेटी को वापस उसी नरक में धकेल देते हैं। याद रखिए, ससुराल में घुटकर मरती बेटी से, मायके में बैठी तलाकशुदा बेटी हजार गुना बेहतर है।
हमारी न्याय व्यवस्था भी सुस्त है। जहां चार्जशीट दाखिल होने में महीनों लग जाते हैं। सालों-साल मुकदमे चलते हैं। कानून की इसी सुस्ती का फायदा उठाकर अपराधी खुलेआम बेल पर घूमते हैं और दूसरी शादी की तैयारी कर रहे होते हैं।
यह 'दहेज प्रथा' नहीं है। इस शब्द को थोड़ा गरिमा देना बंद कीजिए। यह सीधी-सीधी हत्या है। यह एक ऐसा बिजनेस है, जिसमें मुनाफा लड़के वालों का होता है। और कीमत लड़की को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
"कानून किताबों में बंद धूल फांक रहा है, क्योंकि इसे लागू करने वाले समाज की आत्मा मर चुकी है।
अगर आज भी हम इन 5737 चीखों को सुनकर नहीं जाग रहे हैं, तो मान लीजिए कि एक समाज के तौर पर हम वेंटिलेटर पर हैं। अगली बार जब किसी शादी में लाखों-करोड़ों के लेन-देन की नुमाइश देखें, तो ताली मत बजाइएगा; याद रखिएगा कि आप एक होने वाली हत्या की एडवांस बुकिंग के मूक गवाह बन रहे हैं।"
फैसला आपको करना है। चुप्पी साधकर इस कत्लेआम का हिस्सा बने रहना है, या फिर इस हैवानियत के खिलाफ खड़े होकर स्टॉप दहेज प्रथा कहना है।
