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हर दिन हनुमान चालीसा का पाठ करने के 11 अद्वितीय लाभ

Dehradun:ऐसी मान्यता है कि, कलियुग में एक मात्र हनुमान जी ही जीवित देवता हैं। यह अपने भक्तों और आराधकों पर सदैव कृपालु रहते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं।

हनुमान जी की कृपा और उनकी भक्ति के प्रति अनेक कथाएँ और आख्यान हैं जो उनकी महिमा को दर्शाते हैं। तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना की, जो कि एक बहुत ही प्रसिद्ध और पवित्र स्तोत्र है। इसका पाठ करने से भक्तों को आत्मिक शांति और संकटों से मुक्ति की प्राप्ति होती है।

समर्थ रामदास जी, जो कि शिवाजी महाराज के गुरु थे, उन्होंने भी हनुमान जी की भक्ति में गहरी आस्था रखी थी और उनके दर्शन प्राप्त किए थे। यह भी माना जाता है कि जहां भी रामकथा का गान होता है, वहां हनुमान जी अवश्य ही उपस्थित रहते हैं।

इस प्रकार, हनुमान जी की भक्ति और उनकी महिमा का गुणगान अनेक रूपों में किया जाता है और उनकी शक्ति और भक्ति के प्रति आस्था लोगों को प्रेरणा देती है। हनुमान चालीसा का पाठ न केवल आसान है बल्कि इसके चमत्कारी लाभ भी हैं, जो भक्तों को उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करते हैं।

हनुमान चालीसा, जो भगवान हनुमान की स्तुति करता है, भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां हम हनुमान चालीसा के नित्य पाठन के 11 लाभों को उजागर करते हैं:

  1. आत्मविश्वास: हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ता है।
  2. मानसिक शांति: यह गीत मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।
  3. ऊर्जा: यह व्यक्ति को ऊर्जा और ताजगी प्रदान करता है।
  4. भय निवारण: यह व्यक्ति के मन से भय को दूर करता है।
  5. स्वास्थ्य लाभ: यह व्यक्ति के स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करता है।
  6. सकारात्मक सोच: हनुमान चालीसा का पाठ सकारात्मक सोच और दृष्टिकोण विकसित करता है।
  7. धैर्य: यह व्यक्ति में धैर्य और सहनशीलता बढ़ाता है।
  8. संघर्ष से निपटना: यह व्यक्ति को जीवन के संघर्ष से निपटने की शक्ति देता है।
  9. आध्यात्मिक उन्नति: हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में मदद करता है।
  10. शारीरिक बल: यह व्यक्ति के शारीरिक बल को बढ़ाता है।
  11. आर्थिक स्थिरता: हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति की आर्थिक स्थिरता में मदद करता है।

इन सभी लाभों को ध्यान में रखते हुए, हर दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना एक अच्छी आदत है जो हमें जीवन के हर पहलू में सफलता दिलाती है।

हनुमान चालीसा

।। दोहा।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन–कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

।। चौपाई।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मुँज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

लाय संजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हरी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा।। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दु:ख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि–भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत् सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गौसाईं। वृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
जो त बार पाठ कर कोई। छुटहि बंदि महासुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान् चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

।।। दोहा।।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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