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बदरीनाथ के क्षेत्रपाल भगवान घंटाकर्ण की पौराणिक कथा: कैसे एक राक्षस बने धाम के रक्षक

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित भारत के सीमांत गांव माणा और बदरीनाथ धाम के रक्षक भगवान घंटाकर्ण (जिन्हें स्थानीय स्तर पर ‘घंडियाल देवता’ भी कहा जाता है) की कहानी बेहद रोचक और आध्यात्मिक सीख से भरपूर है। पौराणिक ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण) और स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, उनकी कहानी इस प्रकार है:

1. कौन थे घंटाकर्ण?

घंटाकर्ण मूल रूप से एक शक्तिशाली राक्षस (या यक्षराज) थे। वे महादेव शिव के इतने अनन्य और परम भक्त थे कि वे शिव के अलावा किसी अन्य देवता का नाम तक नहीं सुनना चाहते थे।

विशेष रूप से उन्हें भगवान विष्णु (नारायण) के नाम से सख्त चिढ़ थी। भगवान विष्णु का नाम उनके कानों में न पड़े, इसके लिए उन्होंने अपने दोनों कानों में बड़े-बड़े घंटे (घंटी) बांध रखे थे। जब भी कोई उनके सामने विष्णु या नारायण का नाम लेता, वे अपने सिर को जोर-जोर से हिलाने लगते थे ताकि घंटों की तेज आवाज में उन्हें वह नाम सुनाई न दे। कानों (कर्ण) में घंटा बांधने के कारण ही उनका नाम ‘घंटाकर्ण’ पड़ा।

2. मुक्ति की इच्छा और शिव जी का निर्देश

घंटाकर्ण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी कठोर भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।

घंटाकर्ण अपनी राक्षस योनि से त्रस्त हो चुके थे, इसलिए उन्होंने धन-दौलत या शक्ति न मांगकर भगवान शिव से सीधे मोक्ष (मुक्ति) का वरदान मांग लिया।

इस पर भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा— “हे घंटाकर्ण! मोक्ष प्रदान करने का अधिकार केवल चराचर जगत के स्वामी भगवान विष्णु (नारायण) के पास ही है। इसलिए तुम्हें मोक्ष प्राप्त करने के लिए उनकी शरण में ही जाना होगा।”

3. विष्णु की खोज और बदरीनाथ (माणा) आगमन

शिव के मुंह से अपने शत्रु (विष्णु) की बात सुनकर घंटाकर्ण पहले तो असमंजस में पड़ गए, लेकिन शिव की आज्ञा का मान रखने के लिए वे भगवान विष्णु की खोज में निकल पड़े।

उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु इस समय पृथ्वी पर श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं और द्वारका में रहते हैं। जब घंटाकर्ण द्वारका पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि श्री कृष्ण पुत्र प्राप्ति की कामना से भगवान शिव की तपस्या करने के लिए हिमालय (कैलाश) की ओर गए हैं।

घंटाकर्ण तुरंत कैलाश की ओर चल पड़े। जब वे बद्रिकाश्रम (बदरीनाथ और माणा क्षेत्र) पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां भगवान श्री कृष्ण गहरी समाधि में लीन थे।

4. राक्षस योनि से मुक्ति और बदरीनाथ के रक्षक बनना

समाधि में लीन श्री कृष्ण को देखकर घंटाकर्ण को समझ आ गया कि यही नारायण हैं। उन्होंने अपनी वर्षों पुरानी नफरत को भुला दिया और पहली बार अपने कानों के घंटे उतारे। उन्होंने बड़ी श्रद्धा से श्री कृष्ण के सामने जोर-जोर से “नारायण-नारायण” और “गोविंद-गोविंद” का जाप करना शुरू कर दिया।

घंटाकर्ण की आवाज सुनकर भगवान श्री कृष्ण की समाधि टूटी। उन्होंने सामने खड़े विशालकाय राक्षस की असीम श्रद्धा को देखा और उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी शरण में लिया, उनके पूर्व के सभी पापों को क्षमा किया और उन्हें राक्षस योनि से मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया।

मोक्ष प्रदान करने के साथ ही भगवान नारायण ने घंटाकर्ण को एक अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने कहा— “अब से तुम इस संपूर्ण बद्रिकाश्रम क्षेत्र के क्षेत्रपाल (रक्षक और द्वारपाल) कहलाओगे। बदरीनाथ धाम आने वाले हर श्रद्धालु के लिए तुम्हारे दर्शन करना अनिवार्य होगा।”

देवभूमि में घंटाकर्ण (घंडियाल) का महत्व

  • बदरीनाथ के कोतवाल: जिस प्रकार केदारनाथ धाम की सुरक्षा और व्यवस्था का जिम्मा भगवान भैरवनाथ के पास है, उसी प्रकार बदरीनाथ धाम के क्षेत्रपाल और रक्षक भगवान घंटाकर्ण हैं।
  • माणा गांव में वास: भगवान घंटाकर्ण का मुख्य मंदिर बदरीनाथ धाम से मात्र 3 किमी दूर देश के सीमांत गांव माणा में स्थित है।
  • लोक देवता (घंडियाल): गढ़वाल और कुमाऊं के अनेक गांवों में इन्हें ‘घंडियाल देवता’ के रूप में पूजा जाता है और इन्हें सुख, समृद्धि तथा रक्षा करने वाला लोक देवता माना जाता है।
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