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त्याग ऐसा कि देवता भी कांप गए!

उशीनगर नाम का एक समृद्ध राज्य था, जहाँ एक महान और धर्मपरायण राजा राज्य करते थे, उनका नाम था राजा शिवि। वे न केवल न्यायप्रिय थे, बल्कि करुणा और त्याग की मूर्ति थे। उनके दरबार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। वे प्रजा के हर प्राणी को अपना कर्तव्य समझते थे।
राजा शिवि की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी — यहाँ तक कि देवताओं तक। जब देवराज इंद्र को यह पता चला, तो उन्होंने सोचा, “देखें, यह राजा वाकई कितना धर्मनिष्ठ है।” और वे उसकी परीक्षा लेने का निश्चय करते हैं। साथ में उन्होंने अग्निदेव को भी शामिल कर लिया।
इंद्रदेव ने बाज और अग्निदेव ने कबूतर का रूप धारण किया और पृथ्वी लोक पर आ गए। एक दिन,राजा शिवि अपने दरबार में मंत्रियों के साथ बैठकर प्रजा के कार्य देख रहे थे। तभी एक घायल-सा कबूतर कांपता हुआ उड़ता-उड़ता आया और राजा की गोद में छिप गया। डर के मारे उसकी सांसें फूली हुई थीं।

कबूतर इंसानों की भाषा में बोला –”महाराज! मुझ पर एक भयंकर बाज जानलेवा हमला कर रहा है। मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपा करके मेरी रक्षा करें!” राजा शिवि ने स्नेह से कबूतर को गोद में लिया, उसके पंख सहलाए और कहा –”तू अब मेरी शरण में है। जब तक मैं जीवित हूँ, तुझे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता।”

इतने में बाज भी दरबार में आ पहुंचा और गरजते हुए बोला –”राजन! यह कबूतर मेरा आहार है। इसे मुझे लौटा दो। भूख से मेरी जान जा रही है।” राजा शिवि ने शांत स्वर में उत्तर दिया –”यह अब मेरी शरण में है। मैं इसे तुम्हें नहीं दे सकता। लेकिन मैं तुम्हारी भूख का भी समाधान करूंगा। तुम कहो, इस कबूतर के बराबर वजन जितना मांस मैं अपने शरीर से दे दूंगा।”

राजा ने तुरंत एक बड़ा तराजू मंगवाया। एक पलड़े में कबूतर को रखा गया, और दूसरे में राजा ने अपनी जांघ का मांस काटकर रख दिया। परंतु हैरानी की बात यह थी कि पलड़ा हिला भी नहीं। राजा ने और मांस काटा — दूसरी जांघ से, फिर दोनों पैरों से, फिर अपनी एक भुजा से — लेकिन कबूतर का पलड़ा अब भी भारी रहा। अब रक्त से लथपथ, पीड़ा में डूबे राजा शिवि ने एक क्षण भी संकोच नहीं किया — वे स्वयं ही तराजू के पलड़े पर बैठ गए। और तभी! पलड़ा संतुलित हो गया। राजा ने शांति से कहा –”अब मेरा पूरा शरीर ही तुम्हारा आहार है। लो, और अपनी भूख मिटाओ।” बाज और कबूतर कुछ पल शांत रहे — फिर अचानक उनका रूप बदल गया। बाज बन चुके इंद्रदेव और कबूतर बने अग्निदेव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। उन्होंने राजा शिवि की त्याग और वचनबद्धता के लिए प्रशंसा की और बताया कि यह उनकी परीक्षा थी। दोनों देवताओं ने राजा शिवि को पुनः स्वस्थ कर दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनकी शरण में आए प्राणी की रक्षा के लिए उनका नाम सदा अमर रहेगा।

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