एक समय की बात है, परम भक्त बलिग्राम दासिया (जिन्हें दासिया बाउरी के नाम से भी जाना जाता है) के मन में भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी जाने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। यात्रा की तैयारी करते समय उन्होंने सोचा, “मैं अपने प्रभु के पास खाली हाथ कैसे जा सकता हूँ? मुझे उनके लिए कुछ उपहार ले जाना चाहिए।”
तभी उनकी नज़र एक आम विक्रेता पर पड़ी। उसके पास अत्यंत सुंदर, बड़े और रसीले पके हुए आम थे। दासिया को लगा कि ये आम ही मेरे प्रभु के लिए सर्वोत्तम भेंट होंगे। उन्होंने अपनी श्रद्धा के अनुसार लगभग चालीस आम खरीदे और उन्हें एक टोकरी में सजाकर बड़े प्रेम से पुरी की ओर चल पड़े।
जब बलिग्राम दासिया पुरी के सिंहद्वार (मंदिर का मुख्य द्वार) पर पहुँचे, तो वहाँ मौजूद पंडे (पुजारी) उन्हें घेरने लगे। वे सभी दासिया की टोकरी को देखकर समझ गए थे कि वह भगवान को भोग लगाने आए हैं। पंडे आपस में झगड़ने लगे—हर कोई कह रहा था, “मैं ये आम अंदर ले जाऊँगा और भगवान को चढ़ाऊँगा।” उनका उद्देश्य केवल दक्षिणा प्राप्त करना था।
उनकी बहस देखकर बलिग्राम दासिया ने विनम्रतापूर्वक कहा, “मुझे आप लोगों में से किसी के भी माध्यम से ये आम भेजने की आवश्यकता नहीं है।”
यह सुनकर पंडे क्रोधित हो गए और बोले, “तुम कैसी बातें कर रहे हो? अगर तुम ये आम हमें नहीं दोगे, तो ये भगवान तक कैसे पहुँचेंगे? तुम मंदिर के भीतर जा नहीं सकते, और बिना पंडे के भोग लग नहीं सकता। क्या तुम इन्हें वापस घर ले जाओगे? यह भगवान का भोग है, इसे वापस नहीं ले जाया जा सकता।”
भक्त दासिया ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। वह सिंहद्वार से लगभग दस कदम पीछे हटे और आमों की टोकरी ज़मीन पर रख दी। उन्होंने अपनी दृष्टि मंदिर के शिखर पर स्थित ‘नीलचक्र’ पर टिका दी। अपनी आँखें बंद कर उन्होंने मन ही मन भगवान जगन्नाथ का आह्वान किया। उन्हें नीलचक्र में साक्षात भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए।
दासिया ने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर प्रार्थना की, “हे जगन्नाथ! हे ब्रह्मांड के स्वामी! ये आम आपकी ही संपत्ति हैं। मैं एक तुच्छ भक्त हूँ, मैं मंदिर के भीतर नहीं आ सकता और ये ब्राह्मण व्यर्थ में झगड़ रहे हैं। यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो आप स्वयं आकर अपना भोग स्वीकार करें।”
यह कहकर दासिया ने टोकरी से दो आम उठाए और नीलचक्र की ओर दिखाते हुए हवा में छोड़ दिए। देखते ही देखते एक चमत्कार हुआ। आम दासिया के हाथ से गायब हो गए! दासिया एक-एक करके आम उठाते गए और नीलचक्र को दिखाते गए, और हर बार आम हवा में विलीन होकर सीधे भगवान जगन्नाथ के हाथों में पहुँचते गए। भगवान बड़े चाव से अपने भक्त के प्रेम का रसास्वादन कर रहे थे।
वहाँ खड़े पंडे और अन्य लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि टोकरी खाली हो गई है, लेकिन आम कहाँ गए, यह किसी को समझ नहीं आया। उन्होंने दासिया को घेर लिया और पूछने लगे, “यह क्या माया है? इतने सारे आम कहाँ गायब हो गए? क्या तुम कोई जादूगर हो या सम्मोहन जानते हो?”
दासिया ने अपनी भक्ति में लीन होकर उत्तर दिया, “यह कोई जादू नहीं है। त्रिलोकीनाथ ने स्वयं ये आम खाए हैं। यदि आपको विश्वास नहीं है, तो जाकर मंदिर के गर्भगृह में देख लीजिए।”
उत्सुकता और अविश्वास के साथ सभी पंडे दौड़ते हुए मंदिर के भीतर गए। जब उन्होंने गर्भगृह का दरवाजा खोला, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के चारों ओर आमों के छिलके और गुठलियाँ बिखरी पड़ी थीं। पूरा गर्भगृह पके हुए आमों की दिव्य सुगंध से महक रहा था।
यह दृश्य देखकर ब्राह्मणों का अहंकार टूट गया। वे समझ गए कि भगवान को ऊँची जाति, धन या आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने बाहर आकर बलिग्राम दासिया के चरणों में नमन किया और कहा, “आप धन्य हैं! आपकी भक्ति महान है। आज आपने सिद्ध कर दिया कि भगवान केवल प्रेम और भाव के भूखे हैं।”
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