UTTARAKHAND

Chamoli: नंदा देवी राजजात यात्रा 2026 से पहले मार्ग का होगा वैज्ञानिक अध्ययन, यूसैक के वैज्ञानिक परखेंगे बुग्यालों की भार क्षमता

यूसैक के चार से छह सदस्यों वाले दल बुग्यालों में मानवीय हस्तक्षेप से पर्यावरण की चिंता को समझने के लिए कार्य करेगा।

गोपेश्वर: विश्व प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा के पैदल मार्ग का अब वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) के वैज्ञानिक इस 280 किलोमीटर लंबे मार्ग का पारिस्थितिकीय अध्ययन करेंगे, ताकि इसकी भार धारण क्षमता (Carrying Capacity) का सही आकलन किया जा सके।यह अध्ययन 2026 में प्रस्तावित अगली राजजात यात्रा की तैयारियों के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हर 12 साल में आयोजित होने वाली यह ऐतिहासिक पदयात्रा चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड तक जाती है। इस यात्रा में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं, जिससे यात्रा मार्ग के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी दबाव पड़ता है। इसी दबाव और भविष्य की चुनौतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने के लिए यह अध्ययन किया जा रहा है।

अध्ययन के मुख्य बिंदु

यूसैक के वैज्ञानिकों की टीम इस विस्तृत अध्ययन के दौरान कई महत्वपूर्ण पहलुओं का आकलन करेगी। इनमें शामिल हैं:

  • मार्ग पर ऑक्सीजन का स्तर और हवा की गति।
  • ग्लेशियरों की वर्तमान स्थिति और उन पर यात्रा का प्रभाव।
  • मार्ग में पड़ने वाले दुर्लभ जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों का सर्वेक्षण।
  • भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण।
  • श्रद्धालुओं की संख्या का पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण।

क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?

यह अध्ययन नंदा देवी राजजात यात्रा को भविष्य में अधिक सुरक्षित और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ बनाने में मदद करेगा। भार क्षमता के आकलन से यह तय किया जा सकेगा कि एक समय में कितने यात्रियों का गुजरना मार्ग की पारिस्थितिकी के लिए सुरक्षित है। रिपोर्ट के आधार पर, यात्रा के प्रबंधन, पड़ावों पर सुविधाओं के विकास और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि 2014 में हुई पिछली राजजात यात्रा में लगभग 1.50 लाख श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया था और 2026 में यह संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में यात्रा को सुचारू और सुरक्षित रूप से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। यह वैज्ञानिक अध्ययन इन्हीं तैयारियों का एक अहम हिस्सा है, जो आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन साधने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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