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उत्तराखंड: प्राचीन भवन निर्माण शैली से कम हो सकता है आपदा में नुकसान, भूगर्भ वैज्ञानिकों ने सामने रखे तथ्य

देहरादून। उत्तराखंड, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ भूकंप और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए भी जाना जाता है, में आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए विशेषज्ञ अब पारंपरिक भवन निर्माण शैली की ओर देख रहे हैं। भूगर्भ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य की सदियों पुरानी निर्माण तकनीकें, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘कोटी बनाल’, ‘पत्थरकुटी’ और ‘लकड़ी की शैली’ के नाम से जाना जाता है, आधुनिक कंक्रीट की इमारतों की तुलना में आपदाओं का सामना करने में कहीं अधिक सक्षम हैं।

क्या है प्राचीन निर्माण शैली की खासियत?

वैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तराखंड की पारंपरिक भवन निर्माण शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसका लचीलापन और स्थानीय पर्यावरण के साथ सामंजस्य है। इन भवनों के निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री जैसे लकड़ी, पत्थर और मिट्टी का उपयोग किया जाता था।

  • ‘कोटी बनाल’ वास्तुकला: यह शैली विशेष रूप से भूकंपरोधी मानी जाती है। इसमें पत्थर की मोटी दीवारों के बीच लकड़ी के बड़े शहतीरों (बीम) का इस्तेमाल किया जाता है। भूकंप आने पर ये लकड़ी के शहतीर झटकों को सोख लेते हैं और इमारत को ढहने से बचाते हैं। इस शैली में बनी कई इमारतें सदियों से खड़ी हैं और कई बड़े भूकंपों का सामना कर चुकी हैं।
  • पत्थर और लकड़ी का संयोजन: पारंपरिक घरों की दीवारें पत्थरों को जोड़कर बनाई जाती थीं, लेकिन नींव और हर मंजिल पर लकड़ी के मोटे लट्ठों का एक फ्रेम तैयार किया जाता था। यह ढांचा पूरी इमारत को एक साथ बांधे रखता है और कंपन के दौरान इसे स्थिरता प्रदान करता है।
  • ढालदार छतें: स्थानीय पत्थर ‘पठाल’ से बनी ढालदार छतें भारी बर्फबारी और बारिश के पानी को आसानी से नीचे गिरा देती हैं, जिससे इमारत पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता।

वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मत

वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिकों का कहना है कि पहाड़ों में बहुमंजिला कंक्रीट की इमारतें बनाना आपदा को निमंत्रण देने जैसा है। कंक्रीट की संरचनाएं लचीली नहीं होतीं और भूकंप के तेज झटकों में आसानी से ढह सकती हैं। इसके विपरीत, पारंपरिक शैली में लकड़ी और पत्थर का इंटरलॉकिंग सिस्टम होता है, जो संरचना को लचीलापन देता है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि हमें अपनी पारंपरिक बुद्धिमत्ता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनका सुझाव है कि नई इमारतों के डिजाइन में इन प्राचीन तकनीकों के सिद्धांतों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि उन्हें आपदा-प्रतिरोधी बनाया जा सके। आईआईटी रुड़की जैसे संस्थान भी उत्तराखंड की इन पारंपरिक निर्माण तकनीकों पर शोध कर रहे हैं ताकि इनके वैज्ञानिक आधार को समझकर आधुनिक निर्माण में इनका उपयोग किया जा सके।

आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र ने भी माना है कि पारंपरिक शैली से बने घर भूकंप के लिहाज से ज्यादा सुरक्षित हैं। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि पुराने समय में लोग स्थानीय भूगोल और पर्यावरण को ध्यान में रखकर घर बनाते थे, जो आज के समय में आपदा प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण सबक हो सकता है।

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