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ग्लेशियर झीलों पर ‘तीसरी आंख’ की नजर! उत्तराखंड में तबाही रोकने के लिए सेटेलाइट के साथ अब ‘ग्राउंड मॉनिटरिंग’ पर जोर; जानें क्या है मास्टरप्लान

हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का पिघलना और नई झीलों का बनना उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। वर्तमान में इन झीलों की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैटेलाइट का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अंतरिक्ष से मिली तस्वीरों के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं है। ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) जैसी तबाही से बचने के लिए ‘ग्राउंड बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ की सख्त जरूरत है।

देहरादून: हिमालय के सीने पर मौजूद ग्लेशियर झीलें उत्तराखंड के लिए किसी ‘टाइम बम’ से कम नहीं हैं। राज्य में मौजूद करीब 1200 ग्लेशियर झीलों की निगरानी अब केवल अंतरिक्ष (सेटेलाइट) से ही नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर भी की जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) जैसी भीषण आपदाओं से बचने के लिए ग्राउंड बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम ही एकमात्र सुरक्षा कवच है।

13 झीलें ‘डेंजर ज़ोन’ में, 5 पर सबसे अधिक खतरा

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) की 2024 की रिपोर्ट ने उत्तराखंड की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक:

  • उत्तराखंड में कुल 1200 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं।
  • इनमें से 13 झीलें बेहद संवेदनशील श्रेणी में हैं।
  • 5 झीलों को ‘अति संवेदनशील’ माना गया है, जो कभी भी बड़ी तबाही का कारण बन सकती हैं।

क्यों जरूरी है ग्राउंड बेस्ड सिस्टम?

वर्तमान में अधिकांश निगरानी सेटेलाइट के जरिए हो रही है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्राउंड बेस्ड सिस्टम (जमीनी उपकरण) लगाने से झील के जलस्तर में होने वाले मामूली बदलाव का रियल-टाइम डेटा मिल सकेगा। इससे निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को आपदा आने से काफी पहले अलर्ट किया जा सकता है।

NRSC के आंकड़े: 345 झीलें बढ़ा रही हैं धड़कनें

नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के आंकड़ों ने झीलों की विशालता को स्पष्ट किया है:

  • उत्तराखंड में 345 झीलें 0.25 हेक्टेयर से बड़े आकार की हैं।
  • इनमें 8 झीलें 10 से 50 हेक्टेयर जितनी विशाल हैं।
  • बनावट के लिहाज से इनमें 138 मोरेन डैम, 106 आइस डैम और 89 ग्लेशियर इरोजन वाली झीलें शामिल हैं।

13 झीलें ‘डेंजर जोन’ में: NDMA की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

साल 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड की करीब 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 को बेहद संवेदनशील माना गया है। इनमें से:

  • 05 झीलें: ‘अति संवेदनशील’ श्रेणी में हैं।
  • 08 झीलें: ‘संवेदनशील’ श्रेणी में रखी गई हैं।

इन झीलों के फटने से केदारनाथ जैसी त्रासदी का खतरा हमेशा बना रहता है, जिसके चलते केंद्र ने राज्य को निरंतर निगरानी के निर्देश दिए हैं।

फंड की कमी और डेटा शेयरिंग में अड़चन

निगरानी के काम में जुटी मुख्य संस्था ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ (WIHG) के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि फंड आवंटित न होने के कारण पिछले साल झीलों की ग्राउंड मॉनिटरिंग का काम नहीं हो पाया। इसके अलावा, विभिन्न विभागों के बीच ‘डेटा शेयरिंग’ की कमी भी एक बड़ी बाधा है। श्रेय लेने की होड़ में संस्थान अपना ‘रियल टाइम डेटा’ साझा करने से कतराते हैं, जिससे आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर असर पड़ता है।

नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के आंकड़े

हैदराबाद स्थित NRSC के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में 345 ग्लेशियर झीलें ऐसी हैं जिनका आकार 0.25 हेक्टेयर से बड़ा है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार है:

  • आकार के आधार पर: 10 से 50 हेक्टेयर की 8 बड़ी झीलें और 5 से 10 हेक्टेयर की 19 झीलें मौजूद हैं।
  • प्रकार के आधार पर: 138 मोरेन डैम (Moraine-dammed), 106 आइस डैम और 89 ग्लेशियर इरोजन से बनी झीलें हैं।
  • विशेष फोकस: चमोली जिले की वसुंधरा ग्लेशियर झील पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इससे नीचे की आबादी को बड़ा खतरा हो सकता है।

अर्ली वॉर्निंग सिस्टम: भविष्य की जरूरत

वैज्ञानिकों का तर्क है कि जब तक ग्लेशियर के पास ग्राउंड सेंसर नहीं लगेंगे, तब तक खतरे का सटीक समय पर पता लगाना मुश्किल है। NDMA और NRSC मिलकर अब एक ऐसे अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर काम कर रहे हैं, जो झील फटने की स्थिति में आबादी वाले क्षेत्रों तक समय रहते सूचना पहुंचा सके।

सरकार का पक्ष: ‘स्थिति सामान्य है’

दूसरी ओर, आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने आश्वस्त किया है कि विभाग सतर्क है। उन्होंने कहा:

“हमारी टीमों ने 4 प्रमुख झीलों का स्थलीय सर्वे किया है और वर्तमान में स्थिति सामान्य है। इस साल भी 4 से 5 झीलों के सर्वे की योजना है। सैटेलाइट इमेज के जरिए लगातार नजर रखी जा रही है और अन्य भारतीय संस्थानों को भी इस कार्य में जोड़ा जा रहा है।”

चमोली की वसुंधरा झील पर विशेष नजर

विशेषज्ञों का कहना है कि चमोली जिले की वसुंधरा ग्लेशियर झील पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। यदि यहां कोई हलचल होती है, तो इसका सीधा असर घनी आबादी वाले निचले क्षेत्रों पर पड़ेगा।

निष्कर्ष: उत्तराखंड के लिए हिमालयी झीलों की निगरानी केवल वैज्ञानिक शोध नहीं, बल्कि जीवन बचाने की कवायद है। फंड का समय पर मिलना और विभागों के बीच आपसी सामंजस्य ही भविष्य की केदारनाथ जैसी त्रासदियों को रोक पाएगा।


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