हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का पिघलना और नई झीलों का बनना उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। वर्तमान में इन झीलों की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैटेलाइट का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अंतरिक्ष से मिली तस्वीरों के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं है। ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) जैसी तबाही से बचने के लिए ‘ग्राउंड बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ की सख्त जरूरत है।
देहरादून: हिमालय के सीने पर मौजूद ग्लेशियर झीलें उत्तराखंड के लिए किसी ‘टाइम बम’ से कम नहीं हैं। राज्य में मौजूद करीब 1200 ग्लेशियर झीलों की निगरानी अब केवल अंतरिक्ष (सेटेलाइट) से ही नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर भी की जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) जैसी भीषण आपदाओं से बचने के लिए ग्राउंड बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम ही एकमात्र सुरक्षा कवच है।
नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) की 2024 की रिपोर्ट ने उत्तराखंड की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक:
वर्तमान में अधिकांश निगरानी सेटेलाइट के जरिए हो रही है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्राउंड बेस्ड सिस्टम (जमीनी उपकरण) लगाने से झील के जलस्तर में होने वाले मामूली बदलाव का रियल-टाइम डेटा मिल सकेगा। इससे निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को आपदा आने से काफी पहले अलर्ट किया जा सकता है।
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के आंकड़ों ने झीलों की विशालता को स्पष्ट किया है:
साल 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड की करीब 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 को बेहद संवेदनशील माना गया है। इनमें से:
इन झीलों के फटने से केदारनाथ जैसी त्रासदी का खतरा हमेशा बना रहता है, जिसके चलते केंद्र ने राज्य को निरंतर निगरानी के निर्देश दिए हैं।
निगरानी के काम में जुटी मुख्य संस्था ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ (WIHG) के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि फंड आवंटित न होने के कारण पिछले साल झीलों की ग्राउंड मॉनिटरिंग का काम नहीं हो पाया। इसके अलावा, विभिन्न विभागों के बीच ‘डेटा शेयरिंग’ की कमी भी एक बड़ी बाधा है। श्रेय लेने की होड़ में संस्थान अपना ‘रियल टाइम डेटा’ साझा करने से कतराते हैं, जिससे आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर असर पड़ता है।
हैदराबाद स्थित NRSC के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में 345 ग्लेशियर झीलें ऐसी हैं जिनका आकार 0.25 हेक्टेयर से बड़ा है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार है:
वैज्ञानिकों का तर्क है कि जब तक ग्लेशियर के पास ग्राउंड सेंसर नहीं लगेंगे, तब तक खतरे का सटीक समय पर पता लगाना मुश्किल है। NDMA और NRSC मिलकर अब एक ऐसे अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर काम कर रहे हैं, जो झील फटने की स्थिति में आबादी वाले क्षेत्रों तक समय रहते सूचना पहुंचा सके।
दूसरी ओर, आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने आश्वस्त किया है कि विभाग सतर्क है। उन्होंने कहा:
“हमारी टीमों ने 4 प्रमुख झीलों का स्थलीय सर्वे किया है और वर्तमान में स्थिति सामान्य है। इस साल भी 4 से 5 झीलों के सर्वे की योजना है। सैटेलाइट इमेज के जरिए लगातार नजर रखी जा रही है और अन्य भारतीय संस्थानों को भी इस कार्य में जोड़ा जा रहा है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि चमोली जिले की वसुंधरा ग्लेशियर झील पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। यदि यहां कोई हलचल होती है, तो इसका सीधा असर घनी आबादी वाले निचले क्षेत्रों पर पड़ेगा।
निष्कर्ष: उत्तराखंड के लिए हिमालयी झीलों की निगरानी केवल वैज्ञानिक शोध नहीं, बल्कि जीवन बचाने की कवायद है। फंड का समय पर मिलना और विभागों के बीच आपसी सामंजस्य ही भविष्य की केदारनाथ जैसी त्रासदियों को रोक पाएगा।
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