यह बात 1967 की है। रिचर्ड अल्पर्ट, जो अमेरिका की प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे, दुनिया की नज़र में बेहद सफल थे। लेकिन उनके अंदर एक खालीपन था।
रिचर्ड शांति और ईश्वर को खोजने के लिए एलएसडी जैसी नशीली दवाओं का सहारा लेते थे। उन्हें लगता था कि नशा उन्हें भगवान के करीब ले जाता है, लेकिन नशा उतरते ही वे फिर अकेले हो जाते। इसी सच की तलाश उन्हें भारत खींच लाई।
भटकते हुए वे नैनीताल के पास ‘कैंची धाम’ पहुँचे और नीम करोली बाबा से मिले।
बाबा तो अंतर्यामी थे। एक दिन उन्होंने अचानक रिचर्ड से पूछा, “तुम्हारे पास वो ‘दवा’ है जिससे तुम ईश्वर को देखते हो? मुझे दिखाओ।”
रिचर्ड घबरा गए, लेकिन उन्होंने एलएसडी की शीशी निकाल दी। बाबा ने हाथ आगे बढ़ाया। रिचर्ड को लगा बाबा एक गोली मांगेंगे, लेकिन बाबा ने हथेली पर तीन गोलियां रखवा लीं।
रिचर्ड की सांसें थम गईं। एलएसडी की एक गोली ही किसी इंसान को घंटों तक होश से उड़ाने के लिए काफी थी। तीन गोलियां किसी के लिए भी जानलेवा हो सकती थीं। लेकिन इससे पहले कि रिचर्ड कुछ बोल पाते, बाबा ने तीनों गोलियां मुंह में डालीं और पानी के साथ गटक गए।
रिचर्ड डर से कांपने लगे। वे एकटक बाबा को देखते रहे, अब बाबा बहकी बातें करेंगे, अब गिर पड़ेंगे।
एक घंटा बीता… दो घंटे बीते…। बाबा वैसे ही मुस्कुराते रहे। वे भक्तों से बातें करते रहे, काम करते रहे। दुनिया के सबसे खतरनाक नशे का उन पर रत्ती भर भी असर नहीं हुआ। उस दिन उस कंबल वाले बाबा के सामने विज्ञान के सारे नियम फेल हो गए थे।
तब बाबा ने रिचर्ड को वह सीख दी, जिसने उनका जीवन बदल दिया:
“रिचर्ड, ये दवाइयां तुम्हें कुछ पलों के लिए ऊपर ले जा सकती हैं, लेकिन वहां तुम टिक नहीं सकते। नशा उतरते ही नीचे आना पड़ेगा। अगर तुम्हें सच में हमेशा उस मस्ती में रहना है, तो प्रेम और सेवा का नशा करो। यह नशा कभी नहीं उतरता।”
उस दिन ‘प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट’ का अहंकार टूट गया और एक संत ‘राम दास’ का जन्म हुआ। उन्होंने नशीली दवाओं को हमेशा के लिए त्याग दिया और अपना पूरा जीवन बाबा के चरणों में और समाज सेवा में समर्पित कर दिया।
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