धर्म डेस्क। सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या (कुछ जगहों पर पूर्णिमा) के दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, लेकिन सबसे अनोखी परंपरा है—भीगे हुए काले चनों को बिना चबाए निगलना। क्या आप जानते हैं इसके पीछे का कारण क्या है?
वट वृक्ष क्यों है खास?
वट सावित्री व्रत में बरगद (वट) के पेड़ की पूजा का विधान है। वट वृक्ष को लंबी आयु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि बरगद की नीचे लटकती शाखाओं में देवी सावित्री का वास होता है। इस पेड़ की परिक्रमा करने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
चने निगलने के पीछे की पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब यमराज देवी सावित्री के पति सत्यवान के प्राण लेकर जा रहे थे, तब सावित्री ने अपने अटूट संकल्प और पतिव्रता धर्म से यमराज को प्रसन्न कर लिया था।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सत्यवान के प्राण यमराज ले गए थे, तब देवी सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और पतिव्रता धर्म से यमराज को प्रसन्न कर लिया। इसके बाद यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को लौटाए। सावित्री उन चनों को लेकर सत्यवान की मृत देह के पास पहुंचीं और पति के मुख में चने रख दिया। सत्यवान के मुख में यमराज द्वारा दिए गए चने फूंकने से सावित्री देवी के पति को फिर से जीवनदान मिला था। इसी मान्यता के कारण वट सावित्री व्रत की पूजा के दौरान काले चने को प्रसाद के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। तभी से कच्चे काले चनों को बिना चबाए निगलने की परंपरा चली आ रही है। माना जाता है कि ऐसा करना पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य का प्रतीक होता है।
कैसे करें पूजा?
(डिस्क्लेमर: यहाँ दी गई जानकारी मान्यताओं पर आधारित है। tv10 india इसकी सटीकता या वास्तविकता का दावा नहीं करता है। )
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